अमित बिश्नोई
‘नया कश्मीर’ के जोरदार आह्वान और अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से एक बड़े बदलाव का दावा करने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी केंद्र शासित प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों में कश्मीर क्षेत्र की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतार रही है. पार्टी ने घाटी की 47 सीटों में सिर्फ 19 पर ही अपने उम्मीदवार उतारे हैं। बता दें कि नए परिसीमन के बाद जम्मू और कश्मीर की 90 सीटों में से 43 जम्मू क्षेत्र में हैं जबकि शेष 47 कश्मीर में हैं। यहाँ चुनाव तीन चरणों में 8 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को होना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज जम्मू-कश्मीर में डोडा में सभा करके चुनावी बिगुल फूंकने जा रहे हैं. धारा 370 की समाप्ति के बाद पूर्ण राज्य से केंद्र शासित राज्य में बदल जाने वाले इस राज्य में ये पहला चुनाव है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत रूप से कड़ी परीक्षा भी. मोदी और शाह की जोड़ी जम्मू कश्मीर को लेकर बड़े बड़े दावे कर चुकी और कर रही है, अब समय आ गया है उन दावों की परीक्षा का.
खैर बात हो रही थी घाटी में उम्मीदवार उतारने की, तो कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया में भाजपा की प्रतीकात्मक भागीदारी के पीछे दो संभावित कारण हो सकते हैं। पहला कारण इसकी जमीनी स्थिति की यथार्थवादिता को समझना – जहां तक भाजपा का सवाल है, घाटी में मतदाताओं के बीच भावना में कोई बड़ा परिवर्तन आया हो, ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है. भाजपा भी इस हकीकत को बखूबी समझती है यही वजह है कि उसने लोकसभा चुनाव में घाटी से अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और कुछ उसी से मिलता जुलता नज़ारा विधानसभा चुनाव में भी देखा जा सकता है। दूसरा कारण यह है कि भाजपा इस सम्भावना को मानकर चल रही है कि निर्दलीय और छोटी पार्टियों का समर्थन हासिल करके वो जम्मू कश्मीर में सरकार बना सकती है, उसे मालूम है कि मुख्य क्षेत्रीय पार्टियों या फिर कांग्रेस में तोड़फोड़ करना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा लेकिन छोटी पार्टियों और इंडेपेनेंट्स को बस में करना तुलनात्मक रूप से ज़्यादा सरल होगा, वैसे भी घाटी में आज़ाद उम्मीदवार अच्छी संख्या में जीत सकते हैं और किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं.
अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद राज्य के इतिहास में केंद्र की भाजपा सरकार ने पिछले पांच वर्षों में शांति और विकास की कई कहानियों को पेश किया है। आतंकी घटनाओं में भारी गिरावट के दावे किये जा रहे हैं, हालाँकि आज जबकि प्रधानमंत्री जम्मू-कश्मीर का दौरा कर रहे हैं वहां बारामुला में आतंकियों से मुडभेड चल रही है, दो आतंकी ढेर किये जा चुके हैं और चार से ज़्यादा सेना के जवान घायल हुए हैं. साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के आंकड़ों को अगर देखा जाय तो आतंकी घटनाओं में कमी दिखाई गयी है लेकिन जब हम पिछले तीन चार महीनों पर नज़र डालते हैं तो ये आंकड़े गलत लगते हैं। न सिर्फ आतंकी घटनाये बढ़ी हैं बल्कि जवानों की शहादत भी बढ़ी है. खैर ये एक अलग विषय है, बात विधानसभा चुनाव की हो रही है. चुनाव की बात करें तो घाटी के लोगों में उत्साह तो बढ़ा है. इस साल लोकसभा चुनावों में लोगों ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया। लोग घरों से बाहर वोट देने के लिए निकले जिनमें महिलाओं की संख्या ज़्यादा रही. जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र के लिए ये एक शुभ संकेत है, इसका एक संकेत इस बात से भी मिलता है कि जो लोग कश्मीर में चुनाव के बहिष्कार की बात करते थे वो खुद आज चुनाव के मैदान में उतर गए हैं यानि उन्होंने भी लोकतंत्र का रास्ता पकड़ने की पहल की है.
भाजपा को लोकसभा चुनाव में घाटी में अपने उम्मीवार न उतारने की गलती का एहसास है. ऐसा करके भाजपा ने घाटी के लोगों को एक गलत सन्देश दिया। भाजपा के इस कदम से वादी के इलाकों में यही सन्देश गया कि पार्टी का सारा ध्यान हिन्दू बहुल जम्मू पर ही है, वो जम्मू की 43 सीटों के सहारे ही पूरे कश्मीर पर राज करना चाह रही है, यही वजह है कि घाटी की अपनी पिछली यात्रा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी नेताओं के साथ बातचीत के दौरान इस बात को माना कि लोकसभा चुनावों में घाटी की सभी तीन सीटों पर मैदान खाली छोड़ देना एक गलत फैसला था और उसपर उन्होंने खेद भी व्यक्त किया था. उसी गलती को सुधरने के लिए भाजपा ने घाटी में भी उम्मीदवार उतारे हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं से विधानसभा चुनावों के लिए कमर कसने का आग्रह किया है ।
देखने वाली बात होगी कि प्रधानमंत्री मोदी आज डोडा से पार्टी के लिए इस केंद्र शासित प्रदेश में क्या चुनावी माहौल बनाते हैं और राज्य के नेता उस माहौल को कितना आगे बढ़ाते हैं और पार्टी के पक्ष में करते हैं. भाजपा की रणनीति तो स्पष्ट है. उसका लक्ष्य 50 सीटों का है जिसमें जम्मू क्षेत्र की 43 सीटें उसके लिए बेहद ख़ास हैं और घाटी से मिलने सीटें उसके लिए बोनस बन सकती हैं. वहां से उसे जितनी भी सीटें मिल जांय वो उसके लिए प्लस पॉइंट ही होगा। वैसा देखा जाय तो सिर्फ श्रीनगर सीट पर ही उसका कुछ असर दिखता है शेष कश्मीर की सीटें उसके लिए बड़ी समस्या ही हैं। ये ज़रूर हो सकता है कि कुछ सीटों पर NC-कांग्रेस गठबंधन और पीडीपी के बीच वोटों के बंटवारे का भाजपा को फायदा मिल जाय और केंद्र में शासन करने वाली पार्टी की उसी पर नज़र है. बाकी वो कई ऐसी सीटों पर उन इंजीनियर रशीद जैसे उन आज़ाद उम्मीदवारों की मदद भी कर सकती है जो NC-कांग्रेस गठबंधन और पीडीपी को पटखनी देने की स्थिति में होंगे. कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के नेता इस बात को साफ़ तौर पर कह रहे हैं कि प्रॉक्सी वॉर के माध्यम से भाजपा घाटी में अपनी चुनावी लड़ाई लड़ रही है, अपनी लड़ाई जीतने के लिए वो दूसरों पर निर्भर है. विपक्ष की इस बात में काफी सच्चाई नज़र आती है क्योंकि आप सिर्फ जम्मू के सहारे पूरे केंद्र शासित राज्य का दिल नहीं जीत सकते।

