हवा का रूख़ सपा की ओर….

आर्टिकल/इंटरव्यूहवा का रूख़ सपा की ओर….

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हवा का रूख़ सपा की ओर….

-फरीद वारसी

हवा का रूख़ सपा की ओर….

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश चुनावी मोड पर आ चुका है। राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। जो समय के साथ और तेज होंगी। राजनीति में रूचि रखने वालों के बीच यह आमधारणा हैं कि जब किसी दल के कार्यकर्ता, नेता और विधायक अपने-अपने मूल दलों को छोड़ कर किसी अन्य दल में शामिल होने के लिए सक्रिय होते हैं, या उस दल से दूसरे अन्य दल गठबंधन की चाह रखते हैं और यह सारा राजनीतिक माजरा देख कर सत्तारूढ़ दल की बैचेनी सतह पर आती है तो यह साफतौर से माना जाता है कि संबंधित राजनीतिक दल के पक्ष में हवा बह रही है। राजनीति के जानकार भी इस तर्क से सहमत हैं। अब यह बात अलग है कि हिन्दुत्व के रैपर में लिपटे कथित राष्ट्रवाद की बूटी सूंघे अंधभक्त उपरोक्त बातों से सहमत न हों, तो यह उनकी अपनी पीड़ा है। मालूम हो कि उत्तर प्रदेश के गांवों, खेतों, खलियानों, चैपालों और बड़े शहरों में हो रही हैं तमाम तरह की राजनीतिक चर्चाओं का सार यही है कि सूबे में सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है और दीवारों पर लिखी इबारत यह साफ इशारा कर रही है कि 22 में बाइसाइिकल का सत्ता में आना तय माना जा रहा है। जी हां, यहां चर्चा हो रही है प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की। यही कारण है कि हवा का रूख भांप कर गत मंगलवार को बसपा के 7 बागी विधायकों ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से पार्टी कार्यालय में मुलाकात कर प्रदेश के राजनीतिक तापमान को और भी बढ़ाने का काम किया। माना जा रहा है कि अगले माह के पहले सप्ताह में विधान परिषद के चुनाव संपन्न हो जाने के बाद बसपा के यह विधायक बसपा के हाथी से उतर कर सपा की साईकिल पर बैठेंगे। कहा तो यहां तक जा रहा है कि आने वाले दिनों में न सिर्फ बसपा के और विधायक, बल्कि कांगे्रस व यहां तक सत्तारूढ़ दल के असंतुष्ठ विधायक सपा में माकूल समय में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं। वैसे सत्तारूढ दल में असंतुष्ठ और नाराज विधायकों की तादाद कुछ ज्यादा ही है। अब देखना यह है कि इनमें से कितने उधर से इधर आते हैं।

जहां तक समाजवादी पार्टी का सवाल है तो सपा में दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं, नेताओं व पूर्व विधायकों के शामिल होने का सिलसिला कोई वर्तमान समय की बात नहीं है। बल्कि पिछले 2019 के लोकसभा चुनावों के संपन्न हो जाने के बाद से ही दूसरे दलों के नेताओं खासतौर से बसपा के आए बड़ी संख्यों में नेताओं ने अखिलेश और सपा के प्रति अपनी आस्था प्रकट कर सपा की सदस्यता लेने में संकोच नहीं किया। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो माना जा रहा है कि बसपा चुनाव की घोषणा तक बगैर विधायकों वाली पार्टी न बन कर रह जाए और उसके बहुत से कार्यकर्ता भी हाथी से न उतर जाएं। क्योंकि सूबे के विभिन्न जिलों से यही खबरें आ रही है कि सपा में शामिल हो रहे अधिकांश लोग बसपा खेमे के ही हैं। अब बसपा से अपने ही लोगों का मोह क्यों भंग हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। उत्तर प्रदेश के बजाए मायावती की दिलचस्पी जिस तरह से पंजाब के प्रति प्रकट हुई है, यानि अकाली दल से गठबंधन कर, वह उत्तर प्रदेश की राजनीति के संदर्भ में कुछ और ही कहानी की ओर इशारा कर रहा है।

समाजवादी पार्टी जो संघर्ष व जन आंदोलनों की प्रतीक मानी जाती है। इस संदर्भ मे उसका अपना लंबा इतिहास है। युवा अखिलेश यादव के हाथों पार्टी का नेतृत्व होने के कारण सपा को युवाओं की भी पार्टी कहा जाता है। और आज का युवा किसी भी वोटबैंक और जातिय समीकरणों पर अकेले ही भारी पड़े, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं हर वर्ग, हर जाति और लगभग हर संप्रदाय में सपा की अच्छी पकड़ है। खास तौर से ग्रामीण इलाकोें में। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह कि कोरोना की विफलता ही नहीं, बल्कि बहुत सारे ऐसे मुद्दे हैं जिनको लेकर प्रदेश का आम और कमजोर वर्ग चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो सत्तारूढ़ दल से खासा नाराज है और ऐसे अंधकार के समय उसे सपा में उम्मीद की लौ नजर आ रही है। खुद अखिलेश यादव भी चुनावी तैयारियों में जुटे होने के साथ-साथ जनहित के विभिन्न मुद्दों पर योगी सरकार को घेरने का काम कर आम आदमी की आवाज बने हुए हैं। बाकी विपक्ष तो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा है और ऐसे में सपा की इस रणनीति से भगवा खेमे में खलबली मची हुई है।

वहीं दूसरी ओर जिस तरह से गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला कहा जाता है तो ठीक इसी तरह उत्तर प्रदेश को जातिय राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है। चुनावों में जातियगत समीकरणों का अपना महत्व होता है और इसी को ध्यान में रखते हुए अखिलेश यादव अपनी चुनावी बिसात को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं। और बड़े-बड़े दलों के बजाए छोटे-छोटे राजनीति दलों को, जिनकी अपनी-अपनी जाति में अच्छी पकड़ है, उनके साथ गठबंधन के लिए तरजीह दे रहे हैं। अपनादल की नेता पल्लवी पटेल भी सपा के साथ गठबंधन की संभावना तलाशने के लिए अखिलेश यादव से मुलाकात कर चुकी हैं। भाजपा से नाराज ओमप्रकाश राजभर भी अगर जल्द इस कतार में शामिल दिखाई दे, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। अब तो खुद अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करने का संकेत दे कर अपने विरोधियों को जोर का झटका देने का काम किया है, जो इस मुगालते में थे पार्टी और परिवार की फूट 2017 के विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी सपा को राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाएगी। कुछ लोगों का तर्क है कि सपा ने कांग्रेस और बसपा के साथ चुनावी गठबंधन इस लिए नहीं किया क्योंकि अतीत में सपा इनसे गठबंधन करने का परिणाम भुगत चुकी है। कहा जा रहा है कि निरंतर कमजोर हो रही कांगे्रस और बसपा की यह स्थिति ही सपा को चुनावों में मजबूती प्रदान करेगी। यह सच है कि सत्तारूढ़ दल से नाराज वर्गों और समुदायों की संख्या बहुत अधिक है जो कभी कांगे्रस या बसपा के समर्थक हुआ करते थे। लेकिन कांगे्रस और बसपा अब खुद ही डूबता हुआ जहाज साबित हो रहे हैं अब ऐसे में भला कौन इस पर सवारी करेगा, जब मजबूत विकल्प के तौर पर सपा अपना खंम ठोकती हुई नजर आ रही है। वैसे सूत्रों के अनुसार सपा को 2012 में मिले बहुमत से इस बार और भी बड़े बहुमत को हासिल करने के लिए अखिलेश जल्द ही कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल, विधानसभा चुनाव से पहले हो रहे जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनावों को जीतने के लिए सपा ने अपना ध्यान केंद्रित किया है। कहा जा रहा है कि सपा ने प्रदेश के 60 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जाहिर सी बात है कि सपा इन चुनावों में भी पंचायत चुनावों जैसी सफलता हासिल कर पूरे जोश और खरोश के साथ विधानसभा चुनावों में उतरना चाह रही है ताकि सफलता हासिल करने में कोई शक या संदेह न रहे।

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