पारुल सिंघल
उत्तराखंड के रामनगर में कोसी नदी में बाढ़ आने से गिरिजा देवी मंदिर टीले पर एक बार फिर खतरा मंडराने लगा है। अत्याधिक बारिश होने की वजह से नदी का जलस्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया है। वहीं टीले के पानी में बह जाने के आसार भी नजर आने लगे हैं। माना जा रहा है कि प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही के चलते टीला एक बार फिर खतरे में है।
मंदिर की सुरक्षा को लेकर किया था अलर्ट
गिरिजा देवी मंदिर टीले की सुरक्षा को लेकर भूवैज्ञानिक कई बार अलर्ट जारी कर चुके हैं। यही नहीं रिपोर्ट बताती हैं कि 2012 में मुख्यमंत्री ने इस मंदिर के सौंदर्य और सुरक्षा योजना की घोषणा भी की थी, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी मंदिर की सुरक्षा का बजट पास नहीं हो पाया। सैकड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बना यह मंदिर अब बाढ़ का दंश झेलने की स्थिति में नज़र नहीं आ रहा है। माना जा रहा है कि जिस टीले पर मंदिर स्थापित है वह अब काफी कमजोर हो चला है।
1924 में झेली थी बाढ़, नहीं हुआ था बाल भी बाँका
हिमालय की पुत्री पार्वती मां को समर्पित गिरिजा देवी मंदिर को ‘गर्जिया देवी मंदिर’ भी कहा जाता है। सैकड़ों सालों से मंदिर की सुरक्षा करने वाले।इस टीले को अब ख़ुद सुरक्षा की दरकार है । टीले पर जगह-जगह दरारें आ गई है। भू वैज्ञानिकों ने इसको लेकर पहले भी चेतावनी जारी की थी। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब टीला धाराप्रवाह बाढ़ के पानी को झेल रहा है। इससे पहले 1924 में इस टीले ने लाखों क्यूसेक पानी झेला था। इसके बाद 1993 में इसी टीले ने बाढ़ से मंदिर की सुरक्षा की थी। 2010 में भी भारी बाढ़ की वजह से सैकड़ों क्यूसेक पानी भारी मलबे के साथ होकर इस टीले से गुजरा था, लेकिन इसका बाल तब भी बांका नहीं हो सका था।
जब पुजारी की झोपड़ी में लग गयी थी आग
गिरिजा देवी मंदिर का इतिहास लगभग डेढ़ सौ साल पुराना है। माना जाता है कि बाढ़ में बहते हुए मंदिर इस टीले पर आ पहुंचा था। मंदिर यूँ बहता देख भैरव देव ने मां से इसी जगह रुकने की प्रार्थना की। उनका निवेदन सुनकर माँ यही रुक गयी और तब से मंदिर यही स्थापित हो गया। स्थानीय अनुयायियों के अनुसार नैनीताल आने वाले सभी पर्यटक इस मंदिर के दर्शन करने अवश्य आते हैं। यहां मां की शक्ति को साक्षात अनुभव किया जा सकता है। जन कथाओं के अनुसार आज से लगभग 90 साल पहले इस मंदिर के पास एक व्यक्ति की चाय की दुकान थी। वह अपनी झोपड़ी में ही यह दुकान चला रहे थे। उस वक्त वहां चारों ओर बड़ा जंगल था। कोसी नदी के किनारे टीले पर स्थित इस मंदिर के बारे में वन विभाग के अधिकारियों स्थानीय लोगों को ही जानकारी थी। कहा जाता है कि अधिकारियों ने इस मंदिर की देखरेख के लिए चाय की दुकान चलाने वाले व्यक्ति से आग्रह किया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। जिसके बाद उनकी झोपड़ी में अचानक आग लग गयी। आग लगने के बाद वह व्यक्ति तुरंत समझ गया कि मां गिरिजा देवी क्रोधित हो गई है और उन्होंने मंदिर के देखने का बीड़ा संभाल लिया। उनके बाद उनके पुत्र में इस मंदिर का रखरखाव किया।

