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संसद से सड़क तक लहलहाई किसान विवाद की फसल

नवेद शिकोह

किसान आंदोलन को लेकर हंगामा तेज होता जा रहा है। ये विवाद सिर्फ आंदोलनकारियों और सरकार के बीच ही नहीं बल्कि आंदोलन के समर्थकों और विरोधियों की दो ताक़तों में अलग-अलग सूरतें अख्तियार कर रही हैं। किसानों के मुख्य धरना स्थर सिंधु बार्डर पर ही आंदोलनकारियों और आंदोलन विरोधियों के बीच हिंसा ने हालात को और भी संजीदा बना दिया है। धरना स्थल खाली कराने की कोशिश कर रहे लोगो और किसान प्रदर्शनकारियों के बीच इस टकराव में दोनों गुटों के लोगों के साथ सुरक्षाकर्मियों को भी चोटें लगी हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत या फिर लापरवाही से धरना विरोधियों को उपद्रव करने का मौका मिला। इन तमाम विवादों और तनाव के बीच संसद मे शुरू हुआ बजट सत्र भी देश के किसानों के नाम रहा। 16 विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार किया। वहीं राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में किसानों को फायदा पहुँचाने वाली सरकार की उपलब्धियां बयान कीं। उन्होंने किसानों को भ्रमित करने की बात कही। लाल किले पर हुई हरकत को दुखदाई बताया। गणतंत्र दिवस और तिरंगे के अपमान की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। कहा कि अपनी बात रखना और अपनी मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है तो कानून और नियमों का पालन करना भी जरूरी है।

देशभर में इस विषय पर चर्चा तेज हो गई है कि किसान आंदोलन कितना जायज है या कितना गलत है। कोई कह रहा है कि कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ रहे किसानों को सरकार दबाने की कोशिशों में अलग-अलग रणनीतियों को अपना रही है, ताकि प्रदर्शनकारियों को बदनाम करके धरना, आंदोलन और कृषि कानूनों के विरोध को दबा दिया जाए। दूसरी तरफ देश का एक बड़े तबके का आरोप है कि किसान आंदोलन में किसान ही नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधी या सरकार विरोधियों और विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित चंद लोग इस तरह का आंदोलन कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस में लाल किले परिसर में तिरंगे का अपमान करने की साजिश से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कथित किसान आंदोनकारियों की नीयत और इरादों की असली सूरत क्या है।

दूसरी तरफ बीते बृहस्पतिवार को दम तोड़ते किसान आंदोलन का फिर दोबारा शबाब पर आ जाने के बाद यूपी में इसका बड़ा असर दिखाई देने लगा है। ग़ाज़ियाबाद बार्डर से किसानों की वासपी से दुखी टिकैट ने अपने आंसुओं से आंदोलन को पुन:ताकत देकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में आदोलन का जोश तेज कर दिया है। इस बीच यूपी की राजनीति भी किसान प्रकरण में रंग रही है। धरने पर बैठे शीर्ष किसान नेता राकेश टिकैत से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बात की। बसपा सुप्रीमों मायावती ने ट्वीट कर आंदोलनकारी किसानों की मांगे पूरी करने और कृषि कानूनों को खत्म करने की पुनः मांग की। इसी के साथ आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया और लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी ने धरना स्थल पर टिकैत से मुलाकात की।

इन तमाम हालात में ये तो तय है कि कृषि कानूनों को लेकर किसानों की नाराजगी और फिर आंदोलन का उतार चढ़ाव देश की सियासत को एक नई सूरत देगा। ये बात कोई नहीं झुठला सकता कि देश के ज्यादातर किसान इस आंदोलन में न तो शामिल हैं और न ही इसका समर्थन कर रहे हैं। लेकिन यदि सरकार नाराज किसानों को नहीं मना सकी और आंदोलन लम्बा खिंच गया और देश का आधा किसान भी इसके समर्थन मे आ गया तो भाजपा के लिए ये घातक होगा। किसी न किसी तरीके से आंदोलन को खत्म करने के लिए भाजपा सरकारें हर संभव प्रयास कर रही हैं। गले की हड्डी बने कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला भी भाजपा सरकार के लिए काफी नुकसानदेह साबित होगा इसलिए किसानों का आंदोलन सीधी या टेढ़ी किसी भी उंगली से खत्म करना सरकार के लिए बेहद जरुरी है। किसानों की नाराजगी का सिलसिला थमा नहीं तो अगले साल होने वाले यूपी चुनाव में भी इसका असर दिख सकता है और कमजोर विपक्ष को आगे बढ़ने के लिए किसान मुद्दे की बैसाखी मिल सकती है।

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