अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 9 सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव के लिए मंच सज चूका है, प्रदेश में एक बड़े राजनीतिक मुकाबले के लिए मंच तैयार हो चूका है, मंच पर उतरने वाले किरदार पूरी तरह से तैयार हैं, इस मंच के दो मुख्य किरदार हैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव जो 13 नवंबर को होने वाले विधानसभा उपचुनावों में आमने-सामने भिड़ने की तैयारी कर रहे हैं। इस मंच से कांग्रेस पार्टी के किरदार हट चुके हैं हालाँकि परदे के पीछे से हाथी चिंघाड़ने की प्रैक्टिस कर रहा है लेकिन उसे वो चिंघाड़ मिल नहीं पा रही है जो उसकी महावत बहन मायावती जी चाहती हैं, इसलिए मुकाबला प्रभावी रूप से भारतीय जनता पार्टी और सपा के नेतृत्व वाले इंडिया ब्लॉक के बीच बदल गया है. इन उपचुनावों को दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण शक्ति परीक्षण भी कहा जा रहा है।
वैसे तो कहा जाता है कि चुनाव मुद्दों पर लड़े जाते हैं फिर वो चाहे स्थानीय हों या फिर केंद्रीय लेकिन उपचुनावों में मामला बदल जाता है और कहीं न कहीं उपचुनाव सत्ताधारी पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन जाते हैं. हालाँकि इन उपचुनावों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ कहीं न कहीं देश के दो प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों का लिटमस टेस्ट भी कहा जा रहा है क्योंकि इन उपचुनावों को 2027 के विधानसभा चुनावो से जोड़कर देखा जा रहा है. कांग्रेस पार्टी ने शायद इसी वजह से सपा के लिए मैदान खाली कर दिया क्योकि बकौल अखिलेश यादव बात सीटों की नहीं बल्कि जीत की है और इंडिया गठबंधन एक ही सिंबल पर चुनाव लड़ेगा ताकि भाजपा का डटकर और मज़बूती से मुकाबला करते हुए ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल की जांय। इन उपचुनावों के नतीजों का योगी सरकार की मौजूदा सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला लेकिन अखिलेश इन उपचुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल कर इंडिया ब्लॉक् में अपना कद ज़रूर ऊंचा करना चाहते हैं. सपा का मजबूत प्रदर्शन अखिलेश यादव का कद राज्य में और इंडिया ब्लॉक के केंद्रीय व्यक्ति के रूप में बढ़ाएगा, जबकि भाजपा की जीत योगी आदित्यनाथ की पार्टी पर पकड़ और उत्तर प्रदेश पर उनके प्रभाव को फिर से पुष्टि करेगी।
उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के बेहद निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उपचुनाव ऐसे महत्वपूर्ण समय पर हो रहे हैं जब सपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है और कांग्रेस पार्टी का भी वजूद वापस लौटा है. दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए यह उपचुनाव गति को फिर से हासिल करने का अवसर है। इस अवसर को वो किसी कीमत पर गंवाना नहीं चाहते हैं इसलिए उन्होंने एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है, निर्वाचन क्षेत्रों का लगातार दौरा किया है, स्थानीय नेताओं के साथ रणनीति सत्र आयोजित किए हैं और आंतरिक असंतोष को दूर करने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क किया है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि यह उपचुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई के साथ-साथ सीटें जीतने की भी लड़ाई है। आम चुनावों में असफलताओं के बाद योगी आदित्यनाथ को अपने ही खेमे के भीतर से आलोचना का सामना करना पड़ा है और ये उपचुनाव उनके लिए अपने नेतृत्व की पुष्टि करने और चुनावी जीत दिलाने की अपनी क्षमता दिखाने का मौका है। उपचुनावों की तारीख के एलान से पहले ही आदित्यनाथ सबसे आगे दिख रहे हैं, निर्वाचन क्षेत्रों में रैलियाँ और जनसभाएँ कर रहे हैं। युवा मतदाताओं को लक्षित करने वाले सरकार द्वारा आयोजित “रोज़गार मेलों” और किसानों और महिलाओं के लिए नई कल्याणकारी योजनाओं को मूर्त रूप दे रहे हैं. जिन नौ विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें मैनपुरी में करहल, मुरादाबाद में कुंदरकी और गाजियाबाद सदर जैसी प्रमुख सीटें शामिल हैं, जहाँ दोनों पार्टियाँ वर्चस्व के लिए होड़ कर रही हैं। इनमें से करहल समाजवादी पार्टी या कहिये अखिलेश यादव का गढ़ है और भाजपा ने इस गढ़ को भेदने के प्रयास में पूरी ताकत झोंक रखी, अखिलेश ने भी इस सीट को प्रतिष्ठा का सवाल बनाया हुआ है और इस घरेलू सीट पर घर के ही तेज़ प्रताप यादव को मैदान में उतारा है।
कांग्रेस के पीछे हटने के बाद उत्तर प्रदेश में इंडिया ब्लॉक् एकजुट मोर्चा पेश कर रहा है और अखिलेश मजबूती से कमान संभाल रहे हैं। जिन 9 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं उसमें चार पहले सपा के पास थीं, तीन भाजपा के पास और एक-एक निषाद पार्टी और आरएलडी के पास। भाजपा ने इस बार निषाद पार्टी को ठेंगा दिखा दिया है, संजय निषाद भाजपा के इस फैसले से बहुत निराश नज़र आ रहे हैं, उनकी निराशा उनके बयानों में झलकती। लेकिन वो बगावत की स्थिति में भी नहीं हैं इसलिए वो कांग्रेस की तरह कह रहे हैं कि मतलब NDA की जीत से है, इसलिए वो ये कुर्बानी दे रहे हैं हालाँकि सभी को मालूम है कि वो कुर्बानी वाले नेता नहीं हैं और हो सकता वो अपनी जीती हुई सीट पर साइलेंट बन जांय और फायदा सपा ले जाय.
उपचुनाव के नतीजे 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में राजनीतिक कथानक की दिशा तय करेंगे। ये उपचुनाव सिर्फ़ स्थानीय नेतृत्व पर जनमत संग्रह नहीं हैं बल्कि राज्य में व्यापक राजनीतिक मूड का प्रतिबिंब हैं। यह विपक्ष को एकजुट करने और भाजपा को चुनौती देने की अखिलेश की क्षमता का परीक्षण है, ठीक उसी तरह जैसे यह योगी के लिए यह दिखाने का मौका है कि वे अभी भी मतदाताओं का भरोसा हासिल करते हैं। इन उपचुनावों में दांव मुख्य चुनावों से भी ऊंचे हैं, जिसमें प्रतिस्पर्धा कड़ी है और निहितार्थ भी दूरगामी हैं। देखने वाली बात ये होगी कि दूरगामी निहितार्थ वाले इन चुनावों में बाज़ी किसके हाथ लगती है और ’27 का टेम्पो कौन सेट करता है. बेशक विधानसभा के चुनाव महाराष्ट्र और झारखण्ड में हो रहे हैं, सबके नतीजे एक ही दिन आएंगे लेकिन निगाहें लोगों की यूपी के उपचुनावों के नतीजों पर ही होंगी।
