देहरादून। उत्तराखंड में राज्यसभा की सीट को लेकर प्रदेश नेतृत्व द्वारा भेजे गए 10 नामों की लिस्ट ने यह साफ कर दिया है कि प्रदेश के भीतर इस 1 सीट को लेकर उसके पास कोई फार्मूला नहीं है. या फिर यूं कहें कि प्रदेश नेतृत्व के फार्मूले पर कोई भी फिट नहीं बैठ रहा है। शायद यही वजह है कि प्रदेश नेतृत्व राज्य सभा सीट के लिए जिसने भी दावेदारी की उसका नाम सूची में डालते हुए केंद्र को भेज दिया। ऐसे में सवाल ये उठता है जब फैसला केंद्रीय नेतृत्व को करना है तो फिर 10 नामों की लंबी चौड़ी लिस्ट क्यों भेजी गई। जबकि अभी तक राज्यसभा सीट के लिए अमूमन 3 से 5 नामों का पैनल ही केंद्र को भेजा जाता रहा है। दरअसल इस लम्बी लिस्ट ने प्रदेश की एक सीट क़े लिए बाहरी उम्मीदवार की सम्भावनाये बढ़ा रहा है। प्रदेश नेतृत्व के तौर पर संगठन और सरकार के मुखिया दोनों को शामिल माना जा सकता है। ऐसे में चर्चाओं में चल रहे नामो को लेकर भी अपना राजनितिक गणित है।
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प्रदेश का राजनितिक गणित
उत्तराखंड में 10 जून को राज्य सभा की खाली हुई एक सीट पर मतदान होना है। भाजपा के लिए सीट जीतना बड़ी समस्या नहीं प्रॉब्लम इस सीट पर उम्मीदवार को लेकर दिक्क्त है. ऐसे में प्रदेश ने जो लिस्ट केंद्र को भेजी है उसमे पूर्व मुख्य मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का सबसे आगे था। लेकिन उनके अपर हॉउस जाने से प्रदेश में एक गुट को मजबूती देना हों सकता है। जो धामी सरकार के लिए चुनौती पेश कर सकता है। इसके आलावा पार्टी के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष ज्योति प्रसाद गैरोला, प्रदेश महामंत्री कुलदीप कुमार, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष केदार जोशी, कल्पना सैनी, श्यामवीर सैनी, आशा नौटियाल और स्वराज विद्वान इस लिस्ट में शामिल है इस लम्बी चौड़ी लिस्ट से पूर्व मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा और सीएम धामी के लिए सीट छोड़ने वाले कैलाश गहतोड़ी का नाम नहीं जोड़ा गया है. यही लम्बी लिस्ट भाजपा आलाकमान के पेशानी पर बल डाल रहा है। ऐसे में प्रदेश के पैनल से अलग भी सोचा जा रहा है।
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पियूष गोयल हो सकते है उम्मीदवार
उत्तराखंड से एक सीट के लिए दस नाम भेजने का एक राजनीतिक मतलब निकला जा सकता है जिसमे एक सीट के लिए दस नामो का पैनल भेजना प्रदेश में इस सीट पर एक राय न होने का सन्देश देते हुए किसी और को यहां से उम्मीदवार बनाये जाने को लेकर प्रदेश की मूक सहमति माना जा सकता है।
