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वेस्ट यूपी में मजबूत रालोद कर सकती है ज्यादा सीटों की मांग


वेस्ट यूपी में मजबूत रालोद कर सकती है ज्यादा सीटों की मांग

सुनील शर्मा

वेस्ट यूपी में मिली संजीवनी से रालोद की स्थिति बेहद मजबूत हो गयी है। किसान आंदोलन से मिली राह पर चलकर रालोद ने उत्तर प्रदेश में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। इस कामयाबी ने जहां रालोद को बेहतर स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है वहीं पार्टी आने वाले विधानसभा चुनाव में गंठबंधन में शामिल होने से पहले अधिक सीटों की मांग भी कर सकती है। वेस्ट यूपी में रालोद के बढ़ते जनाधार को देखते हुए उसकी यह मांग अनुचित भी नहीं ठहराई जा सकती।

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद राष्ट्रीय लोकदल ने अपना जाट-मुस्लिम समीकरण खो दिया था जिसका परिणाम उसे आने वाले चुनावों में देखना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव के रालोद मुखिया चौधरी अजीत सिंह को हार का सामना करना पड़ा। वहीं रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी को भी आशातीत सफलता नहीं मिली। इसके बाद से रालोद वेस्ट यूपी में खोई जमीन को वापस हासिल करने का प्रयास कर रहा था।

किसान आंदोलन में जब राकेश टिकैत की भावनाएं आंसू बनकर बहीं तो रालोद मुखिया अजीत सिंह ने टिकैत को सहारा देने में देर नहीं लगायी। इसके बाद हुई महापंचायत में भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत कह बैठे की चुनाव में चौधरी अजित सिंह को हराकर गलती हुई है जिसे दोबारा नहीं दोहरायेंगे। किसान आंदोलन में लीडर बनकर उभरी भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के यह शब्द रालोद के लिये संजीवनी साबित हुए और जयंत चौधरी ने वेस्ट यूपी में महापंचायतों का सिलसिला शुरू कर दिया। इन महापंचायतों को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का भी समर्थन मिला और अपार भीड़ रालोद के समर्थन में जुटने लगी। रालोद के जाट-मुस्लिम वोटर इन महापंचायतों के माध्यम से एक बार फिर साथ खड़े हो गये। इसका लाभ रालोद को त्रिस्तीय पंचायत चुनाव में मिला जिसमें पार्टी के प्रत्याशियों ने 70 से अधिक सीटों पर कब्जा किया। कई जिलों में रालोद जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने की स्थिति में आ चुकी है।

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में मिली सफलता ने रालोद को जहां संजीवनी दी है वहीं अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिये मजबूत आधार भी तैयार कर दिया है। रालोद को मिली संजीवनी की अहमियत का अहसास रालोद को भी है। अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव से पूर्व राजनीतिक गठबंधन करने के लिये पार्टी नेतृत्व भी इस समय अपनी मजबूत स्थिति का आंकलन कर रहा है। आने वाले चुनाव के लिये भले ही कोई अधिकारिक घोषणा न हुई हो मगर महापंचायतों में सपा-रालोद नेताओं की एकजुटता, अखिलेश यादव और जयंत चौधरी का एक ही मंच पर मौजूद होना यह सुनिश्चित कर रहा है कि यूपी विधानसभा चुनाव से पूर्व दोनों राजनीतिक दलों में अधिकारिक गठबंधन की घोषणा कर दी जायेगी। वहीं आजाद समाज पार्टी के मुखिया चन्द्रशेखर आजाद रावण ने भी सपा-रालोद गठबंधन को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में गठबंधन निश्चित ही मजबूती के साथ चुनावी मैदान में उतरेगा।

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सपा-रालोद के गठबंधन पर यूं तो अनौपचारिक मुहर लग गयी है लेकिन बदले हालात में कुछ नीतिगत बदलाव होने की संभावना है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में 2019 में हुए लोकसभा चुनाव को सपा, रालोद और बसपा के गठबंधन ने मिलकर लड़ा था। हालांकि नतीजे आशानुसार नहीं आये और उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को निराशा का सामना करना पड़ा। तब भी महागठबंधन में रालोद को दी जा रही सीटों की संख्या पर पेंच फंसा था। उस समय रालोद आज जैसी मजबूत स्थिति में नहीं थी। कृषि कानून के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन का राजनीतिक लाभ लेने में सिर्फ रालोद को ही कामयाबी मिली है। वेस्ट यूपी में बेहद मजबूत स्थिति में आ चुकी रालोद को कम आंकना गठबंधन के लिये संभव नहीं होगा। वहीं चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद लोगों की सहानुभूति भी वर्तमान रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ है। ऐसे में रालोद यह जरूर चाहेगी कि उसकी सीटों में खासकर वेस्ट यूपी में बढ़ोतरी जरूर हो। समाजवादी पार्टी यदि इस बात के लिये तैयार हो जाती है तो उसके समक्ष वेस्ट यूपी में जनाधार खोने का खतरा रहेगा। वहीं आजाद समाज पार्टी को गठबंधन में शामिल करने के लिये उसको भी कुछ सीटें अवश्य देनी होंगी। हालांकि बसपा के गठबंधन में शामिल होने की संभावना न के समान है। ऐसे में गठबंधन को लेकर अनिश्चितता तो नहीं है मगर यह भी तय है कि अभी कई स्तरों पर बातचीत और समझौते होने बाकी हैं।

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