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दास्ताने ओलम्पिक: 470 करोड़ में सिर्फ 6 पदक

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अमित बिश्नोई
2013 में प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी जी ने एक भाषण दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि यह सरकार की गलती है कि भारत ओलंपिक में पदक नहीं जीत पाता। उन्होंने बाकायदा एक योजना भी बताई जिससे भारत ओलंपिक में आसानी से अधिक पदक जीत सकता है। उन्होंने कहा था कि अगर सेना के जवानों की मैपिंग की जाय और खेलों में रूचि रखने वाले जवानों को अलग कर उन्हें ये ज़िम्मेदारी दी जाय तो पांच सात मैडल तो वैसे ही भारत की झोली में आ जायेंगे। उस समय मोदी जी सत्ता में आने की तैयारी कर रहे थे, 2012 के लंदन ओलम्पिक हो चुके थे, 83 खिलाडियों का दस्ता गया था, दो रजत और चार कांस्य पदक समेत 6 मैडल मिले थे और 55वीं रैंकिंग आयी थी. अब 2024 में भी भारतीय दल को 6 मैडल ही मिले हैं जिसमें रजत की संख्या एक है बाकी कांस्य पदक हैं और रैंकिंग 71 वीं है.

मोदी जी के भाषण का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि उनके कार्यकाल में ये दूसरा ओलम्पिक था, उस भाषण में उन्होंने कहा था कि मैं जहाँ जाता हूँ वहां ये बात सुनने को मिलती है कि 120 करोड़ की आबादी वाला देश (बीस करोड़ पिछले 10 साल में जुड़े हैं) बस दो चार मेडल ही जीत पाता है जबकि छोटे छोटे देश दर्जनों गोल्ड मेडल जीत जाते हैं. उनके भाषण को और उनके प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल को एक दशक हो चूका है लेकिन जो हालात 2013 में उनके भाषण के समय थे वही हालात आज भी हैं, बल्कि कह सकते हैं कि उससे भी खराब।

मेरे कहने का मतलब ये नहीं हैं कि प्रधानमंत्री ने खेलों को बढ़ावा नहीं दिया है, बहुत बढ़ावा दिया है, खिलाडी जब भी कोई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में कोई बड़ा कारनामा करता है, कोई पदक या टाइटल जीतता है तो व्यक्तिगत तौर पर उससे टेलीफोनिक टॉक करते हैं, मुलाकात भी करते हैं, ये अलग बात है कि देश का नाम रौशन करने वाले ये खिलाड़ी जब अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं तो उनके पास उनसे मिलने का समय नहीं होता लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो उनका भला नहीं चाहते, उनकी परवाह नहीं करते। अभी ताज़ा मिसाल पेरिस ओलम्पिक की है जब विनेश फोगाट (जंतर मंतर पर यौन शोषण के विरोध में आंदोलन करने वाली पहलवान) 50 किलोग्राम कुश्ती स्पर्धा के फाइनल में पहुँचने वाली देश की पहली महिला पहलवान बनी तब प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही उन्हें बधाई नहीं दी लेकिन जैसे ही 100 ग्राम वजन बढ़ने की वजह से विनेश को स्पर्धा से बाहर कर दिया गया तब वो फ़ौरन विनेश का हौसला बढ़ाने आगे आये और कानूनी मदद के लिए मशहूर वकील हरीश साल्वे के सेवाएं भी उपलब्ध कराईं। यकीन जानिए कि अगर 100 ग्राम का कांड न हुआ होता तो वो विनेश से बात भी करते और चाय पर घर भी बुलाते।

परिणाम भले ही पिछले ओलम्पिक से बुरे आये हों लेकिन प्रधानमंत्री ने खिलाडियों की तैयारी के लिए दिल खोलकर धन उपलब्ध कराया। 117 खिलाडियों के दल की तैयारी के लिए 470 करोड़ रूपये खर्च किये, बाकी खिलाडियों पर जो खर्च किये वो किये ही, विनेश पर अकेले 70 करोड़ रूपये से ज़्यादा खर्च किये इसलिए कोई भेदभाव का आरोप उनपर नहीं लगा सकता। पता नहीं लोग क्यों 100 ग्राम कांड को जंतर मंतर के आंदोलन से जोड़ रहे हैं। 470 करोड़ की रकम बहुत बड़ी होती है, अब पता नहीं अमेरिका, चीन और जापान वाले अपने खिलाडियों पर कितना खर्च करते हैं लेकिन अपने यहाँ तो इसबार औसत निकालें तो लगभग एक खिलाडी पर 4 करोड़ रुपया पड़ा, हालाँकि इसमें कुछ खिलाडियों पर ज़्यादा और कुछ पर काफी कम खर्च हुआ होगा. वहीँ अगर हम इस भारी भरकम रकम को मिले पदकों से डिवाइड कर दें तो एक पदक 78.33 करोड़ का पड़ा.

अब इतने मंहगे पदक के लिए प्रधानमंत्री मोदी जी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, इसके लिए तो खिलाडी और उनकी तैयारी में लगे लोग ही ज़िम्मेदार हुए न. मोदी जी ने तो सुविधाएँ देने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन अब पदकों की संख्या न बढ़ पाए तो क्या किया जाय. पेरिस ओलम्पिक ख़त्म हो चुका है, हम टोक्यो ओलम्पिक से एक कदम पीछे आ चुके हैं, अगला ओलम्पिक अमेरिका के लॉस एंजिलिस में है जिसने पेरिस में 40 गोल्ड मैडल समेत 126 पदक हासिल किये हैं. मुझे उम्मीद है कि अगर खिलाडी प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा दी जा रही सुविधाओं का अगले चार साल में भरपूर उपयोग करेंगे और 126 तो नहीं, हाँ 26 मैडल लाने की सम्भावना ज़रूर बन सकती है। आप कहेंगे कि मैंने कुछ ज़्यादा बोल दिया। वो इसलिए बोला है कि कोशिश करेंगे 26 के आधे यानि 12-13 तो आ ही सकते हैं। उम्मीद है पेरिस ओलम्पिक का ये पोस्टमॉर्टेम आपको अच्छा लगा होगा।

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