Site icon Buziness Bytes Hindi

बसपा के वोट बैंक पर टिकी सपा की निगाह


बसपा के वोट बैंक पर टिकी सपा की निगाह

सुनील शर्मा।

यादव-मुस्लिम-पिछड़ा गठजोड़ के चलते उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाल चुकी समाजवादी पार्टी ने अब दलित वोट बैंक पर भी निगाहें गढ़ा ली हैं। हालिया दिनों में बसपा के अनेक नेता जहां समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हैं वही अखिलेश यादव भी अपनी हर रैली में दलित समाज से जुड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं। ऐसे में स्पष्ट हो रहा है कि पिछड़ों के साथ अब समाजवादी पार्टी दलित वोट बैंक को भी अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक का खासा प्रभाव है। क्योंकि यूपी में 24 प्रतिशत वोट बैंक दलित समुदाय का है जो किसी भी चुनाव को एकतरफा करने में सक्षम है। इसी दलित वोट बैंक के सहारे बहुजन समाज पार्टी की मायावती चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। दलित समाज को बसपा का ही वोट बैंक माना जाता है। हालांकि कुछ समय से दलित वोट बैंक बसपा से बिछुड़ा हुआ नजर आ रहा है। 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी दलितों ने बसपा को वोट नहीं दिया जिसके कारण पार्टी को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा था। बसपा प्रमुख मायावती भी इस बात को भलीभांति समझ गई थी और दलित समाज के मुद्दों को लगातार उठा रही थीं। वहीं दलित नेताओं को भी सिर्फ बसपा में ही सम्मान और स्थान मिलने की बात कह मायावती दलित नेताओं को अन्य दलों में शामिल होने से रोके हुईं थीं। लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव की बेला में बसपा के नेताओं ने पाला बदला और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। ऐसे में चुनावी अभियान में जुटी बसपा को बड़ा झटका लगा है।

Read also: अपना दल के एक गुट ने समाजवादी पार्टी से किया समझौता

वही पूर्व बसपा नेताओं को सपा में शामिल कर अखिलेश यादव पार्टी की छवि दलित हितैषी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अखिलेश यादव अपनी हर रैली में दलित समाज से जुड़े उन मुद्दों को उठा रहे हैं जिन्हें अब तक मायावती लेकर चल रही थी। निजीकरण के चलते सरकारी नौकरियां कम होने को लेकर सरकार पर सवाल खड़ा करने के साथ प्रदेश में जातिगत जनगणना कराने की मांग अपनी रैलियों में करने वाले अखिलेश यादव दलितों के साथ होने वाले प्रत्येक अपराध पर भाजपा सरकार पर निशाना साध रहे हैं। गौरतलब है कि हाल ही में बसपा नेता लालजी वर्मा 6 विधायकों के साथ सपा में शामिल हुए हैं। वही राम अचल राजभर भी अब सपा का ही झंडा बुलंद करते नजर आ रहे हैं। दलित नेता सावित्रीबाई फुले से गठबंधन करने वाली सपा की बात आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण से भी चल रही है। यानी दलित नेताओं के साथ दलित वोट बैंक हासिल करने की तमन्ना अब सपा के मन में भी है।

माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में बदलते राजनीतिक समीकरणों के चलते समाजवादी पार्टी ने दलित वोट बैंक को अपने पाले में खींचने का प्रयास किया है। यूपी की राजनीति में ओवैसी का दखल होने के बाद सपा को मुस्लिम वोटर कटने की आशंका सता रही है। ऐसे में दलित वोट बैंक उसका सहारा बन सकता है। वही दलित समाज ने यदि सपा का दामन पूरी तरह से थाम लिया तो सपा को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता।

सपा की इस रणनीति को बसपा प्रमुख मायावती भी भली-भांति जान रही हंैं। यही कारण है कि मायावती सत्तारूढ़ भाजपा से ज्यादा समाजवादी पार्टी पर हमला बोलती रहीं हैं। सपा के दलित प्रेम को नाटकबाजी बताने वाली मायावती ने दलित महापुरुषों और गुरुओं का तिरस्कार करने का आरोप समाजवादी पार्टी पर अनेक बार लगाया है। वहीं अपने वोट बैंक को सहेजने के लिए मायावती भी निरंतर प्रयास कर रही हैं। अनेक मौकों पर मायावती ने यह भी संदेश दिया है कि दलित नेताओं को सही समान और उचित स्थान सिर्फ बहुजन समाज पार्टी में ही मिलता है।

Read also: विचार चित्रण – समाजवादी पार्टी

वही समाजवादी पार्टी के लिए भी दलित वोट बैंक को अपने पाले में खींचना इतना आसान नहीं होगा। कारण यह है की उत्तर प्रदेश के गांव में आज भी पिछड़ों और दलितों की कई जातियों के बीच मनमुटाव की स्थिति है। यही कारण है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में हुआ सपा और बसपा का गठबंधन आशातीत सफलता हासिल नहीं कर पाया। उस चुनाव में सपा के वोट तो बसपा के पाले में गए मगर बसपा का मूल वोट बैंक यानी दलित समाज ने सपा को वोट नहीं किया। ऐसे में अखिलेश यादव दलित वोट बैंक को अपने पाले में खींचने में जितना कामयाब हो जाएंगे सत्ता की कुर्सी उनके उतनी ही नजदीक आ दी जाएगी। इन दिनों सपा के नेता भी मायावती के उस बयान का बार-बार जिक्र कर रहे हैं जिसमें मायावती ने सपा को हराने के लिए भाजपा का भी साथ देने की बात कही थी। यानि सपा दलित मतदाताओं तक यह संदेश देना चाहती है कि मायावती अंदरखाने भाजपा के ही साथ हैं। सपा को लगता है कि भाजपा से नाराज दलित वोटर यदि इस बात पर यकीन कर ले तो वह बसपा को भी वोट नहीं देगा। ऐसे में बसपा से छिटका दलित वोटर उनके पाले में ही आकर गिरेगा।

Exit mobile version