Special Story: देवबंद में सद्भावना संसद की बात क्यों?

आर्टिकल/इंटरव्यूSpecial Story: देवबंद में सद्भावना संसद की बात क्यों?

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Jamiat Ulema-E-Hind Deoband – देवबंद में आज जमीअतुल उल्माए हिन्द मदनी गुट के सम्मलेन के पहले दिन देश के मौजूदा हालात पर कई तजवीज़ें पेश हुए जिनमें सबसे ख़ास है देश के एक हज़ार स्थानों पर सद्भावना संसद का आयोजन जो अगले साल मार्च से शुरू होना हैं. इस सद्भावना संसद का मकसद देश में फ़ैल रहे इस्लामोफोबिया के खिलाफ लोगों को जागरूक करना, नफरत बढ़ती की राजनीति के ख़राब परिणामों के बारे में लोगों को बताना और खत्म होते साम्प्रदायिक सद्भाव फिर बहाली के प्रयास करना है. लेकिन इस सद्भावना संसद को लोग धर्म संसद की कॉपी बताने लगे हैं. लोगों का मानना है कि इस बात की क्या गारंटी है इसमें ऐसी बातें नहीं कही जाएंगी जिनसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचे। 

दरअसल कुछ धर्म संसदों पर पहले ही काफी बवाल मच चुका है जिसमें एक धर्म विशेष के खिलाफ अपमानजनक बातें कही गयी थीं और जिनमें मुकदमें भी दर्ज हुए और गिरफ्तारियां भी हुई थीं. बाद में धर्म संसद का नाम बदलकर धर्म सम्मलेन कर दिया गया और उस नाम से कुछ आयोजन हुए जो विवादित रहे. अब लोगों का मानना है कि मुस्लिम संगठन की ओर से भी इस तरह के आयोजन जिनका नाम भले ही सद्भावना हो, दक्षिणपंथी संगठनों को मुसलमानों को घेरने का एक मौका देगा। 

इनके अलावा जिन जिन राज्यों में इस तरह की सद्भावना संसद आयोजित होंगी वहां भी कानून व्यवस्था का एक मसला खड़ा होगा, ऐसे संसदों को अनुमति देने न देने पर भी विवाद पैदा होगा जिसको लेकर राजनीति भी होनी लाज़मी होगी। राज्य सरकारों के लिए यह सद्भावना संसद एक बड़ी समस्या बन सकती हैं, कई राज्यों के चुनाव हैं जहाँ इस तरह के आयोजनों को लेकर साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण का खेल भी शुरू हो सकता है.

वैसे तो मौलाना महमूद मदनी को एक सॉफ्ट मुस्लिम धर्मगुरु माना जाता है और अक्सर उनपर सरकार के नज़दीक होने का आरोप भी लगता रहता है, आज देवबंद में उनके सम्बोधन में सॉरी बातें देश को जोड़ने, मुसलमानों के सब्र की, बेइज़्ज़त होने के बावजूद देश की एकता के लिए हमेशा खड़े रहने की गयीं, नफरत को मोहब्बत से हराने की सीख दी गयी लेकिन एक बात उन्होंने ज़रूर कही कि वक्त पड़ने पर देश की जेलों को भी मुसलमान आबाद कर सकते हैं. उनकी इस बात का लोग कई तरह से मतलब निकाल रहे हैं और सद्भावना संसदों के आयोजन की बात पर सवाल उठा रहे हैं. सवाल यही है कि क्या इन सद्भावना संसदों को स्वरुप पूर्व की धर्म संसदों जैसा तो नहीं होगा? बात निकलेगी तो लोग सवाल पूछेंगे ही. कहीं यह सद्भावना संसद माहौल बनाने की जगह और न बिगाड़ दें.

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