तो बीजेपी के दो योद्धाओं के बीच भी लड़ा जा रहा युपी चुनाव!

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तो बीजेपी के दो योद्धाओं के बीच भी लड़ा जा रहा युपी चुनाव!

  • घटनाएं इशारा करती हैं, कुछ तो पक रहा है योगी और अमित शाह के बीच

ऊषा सिंह

चुनाव में सभी दल एक-दूसरे से लड़ते हैं। बीजेपी भी विपक्षी दलों से लड़ रही है या यों कहें कि सत्ता से हटाने के लिए विपक्षी दल बीजेपी से लड़ रहे हैं। यह तो जगजाहिर है लेकिन इस चुनाव में एक बड़ी लड़ाई और लड़ी जा रही है? वह लड़ाई बीजेपी के अंदर चल रही है? ये लड़ाई है केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के बीच। यह लड़ाई सामने भले न दिख रही हो लेकिन कई ऐसी घटनाएं हैं जो इस  ओर इशारा करती हैं। ये इशारे बताते हैं कि अंदर ही अंदर कुछ तो पक रहा है, जिसका नुकसान बीजेपी को  उठाना पड़  सकता है।
 
छह महीने पहले सुनाई देने लगी थी आहट

इस लड़ाई की सुगबुगाहट करीब छह महीने पहले से सुनाई देने लगी थी जब चुनावी राज्यों में मुख्यमंत्रियों के बदलने का सिलसिला शुरू हुआ। उस समय यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को हटाने की चर्चा भी तेज थी। माना जा रहा था कि केंद्रीय नेतृत्व योगी को हटाना चाहता है। काफी कोशिश के बावजूद उनको नहीं हटाया जा सका।  सूत्रों से खबर आई कि योगी को आरएसएस का साथ मिल गया है। अब  यहां सवाल उठे कि आखिर कौन है  जो  योगी को हटाना चाहता है? निश्चित तौर पर केंद्र में दो ही  बड़े नाम हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और  गृह मंत्री अमित शाह।

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टेनी और लखीमपुर कांड

उसके बाद लखीमपुर कांड होता है। हमें इस  कांड की पृष्ठभूमि भी समझनी पड़ेगी। जब किसान आंदोलन चरम पर था, उसी बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार होता है। इसमें ब्राह्मण चेहरे के तौर पर अजय मिश्र मिश्र टेनी को शामिल किया जाता है ताकि उसका लाभ यूपी चुनाव में मिल  सके। उनको अमित शाह के साथ गृह मंत्रालय में रखा जाता है। अब  सवाल  यहां  उठे कि क्या टेनी ही यूपी में ब्राह्मण चेहरा थे। उससे पहले  उनको कितने लोग ब्राह्मण नेता के तौर पर जानते थे? उससे बड़े ब्राह्मण चेहरे तो यूपी कैबिनेट में बहुत से हैं। केंद्रीय गृह  राज्य मंत्री बनते ही टेनी लखीमपुर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों को भड़काने के कई प्रयास करते हैं। उनको चिढ़ाते हैं और मंच से उन्हें सुधारने की धमकी  देते हैं। फिर भी किसान शांत  रहते हैं तो उसके बाद उन पर गाड़ी चढ़ा दी जाती है। पश्चिमी यूपी में पहले से बीजेपी की मुश्किलें बढ़ी हुई थीं और  लखीमपुर की घटना के बाद तराई बेल्ट में भी किसानों में नाराजगी बढ़ जाती है।
 
कानून वापस हुए लेकिन टेनी नहीं

किसान लखनऊ में महापंचायत करते हैँ। उसमें एक अहम  मांग अजय मिश्र टेनी की बर्खास्तगी की भी होती है। उससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीनों कृषि कानून वापस करने का ऐलान कर देते हैं। मैसेज यह जाता है या दिया जाता है कि यूपी चुनाव के लिए प्रधानमंत्री ने यह निर्णय लिया। उसी दौरान लखनऊ में डीजीपी कांफ्रेंस होती है। उसमें टेनी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह के के साथ मंच साझा करते हैं। यही वजह है कि तीन कृषि कानून वापस लेने के बावजूद किसानों का गुस्सा शांत नहीं होता।

अभी तक फंसा पेंच

हालांकि एमएसपी और अन्य मांगें  मानने के बाद दिल्ली की सीमाओं से किसान आंदोलन समाप्त हो गया है लेकिन अजय मिश्र टेनी अब भी पद पर बरकरार हैं। उनको यूपी चुनाव में प्रचार से रोक दिया गया है। उनके  संसद में जाने पर भी  पाबंदी लगा दी गई थी। अब सवाल यह उठ  रहा है कि किसानों और विपक्ष की पुरजोर मांग के बावजूद उनको मंत्रिमंडल से हटाया क्यों नहीं जा रहा? टेनी पद पर रहेंगे तो बीजेपी को चुनाव में नुकसान नहीं होगा?

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योगी सख्त, केंद्र की हमदर्दी

वहीं  लखीमपुर मामले में यूपी सरकार के  ऐक्शन  की बात करें तो पहले दिन से ही सख्त ऐक्शन लिए गए। घटना के  तुरंत बाद एडीजी कानून व्यवस्था और अधिकारी  वहां पहुंचते हैं। किसानों ने जो मांगे रखीं और जिसके खिलाफ एफआईआर लिखाई  वह दर्ज कर  ली गई। टेनी के पुत्र आशीष मिश्र को  गिरफ्तार कर लिया गया। किसानों की  मांग पर ही रिटायर्ड जज की निगरानी में एसआईटी गठित की गई। एसआईटी ने जांच में  आया कि यह घटना लापरवाही नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति थी। उस आधार पर सभी 13 अभियुक्तों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हो गया। मतलब साफ है कि लखीमपुर मामले में केंद्र सरकार लगातार टेनी का संरक्षण कर रही है। वहीं योगी  सरकार  का रवैया सख्त है।
 
निषादों को नाराज किया

हाल ही में निषाद पार्टी की रैली में योगी और अमित  शाह मंच पर एक साथ थे। निषाद पार्टी की मांग है कि निषाद समाज को अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया जाए। उम्मीद यह थी कि अमित शाह इस रैली में इसका ऐलान कर देंगे। निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद यही समझाकर अपने समर्थकों को लेकर आए थे लेकिन इस तरह का कोई ऐलान अमित शाह ने नहीं किया है। इससे निषाद पार्टी के कार्यकर्ता रैली स्थल पर ही काफी नाराज दिखे।

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राष्ट्रीय राजनीति में कद की लड़ाई

अब समझते हैं कि आखिर क्या वजह है अमित शाह और योगी के बीच इस अंतर्द्वंद्व  की। दरअसल, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अमित शाह पार्टी में नंबर दो की  हैसियत रखते हैं। यूपी का मुख्यमंत्री  बनने के बाद से योगी का कद लगातार बढ़ रहा है। माना यह  भी  जाता है कि केंद्रीय सत्ता में रहने वाली पार्टी में सबसे बड़े प्रदेश यूपी का  सीएम  यदि पांच साल का कार्यकाल पूरा कर  लेता है तो उसका कद राष्ट्रीय स्तर पर और बड़ा हो जाता है। यही वजह है कि देश की आजादी के बाद से कांग्रेस और बीजेपी की सरकारें रहीं लेकिन यूपी का कोई सीएम पांच साल पूरे नहीं कर पाया। उसे कार्यकाल पूरा करने से पहले ही हटा दिया गया। अब यह तय है कि योगी कार्यकाल  पूरा कर लेंगे तो और उनके चेहरे पर पार्टी पूर्ण बहुमत से चुनाव जीत गई तो कद कई गुना बढ़ जाएगा। ऐसे में अमित शाह का कद उनसे छोटा हो सकता है। पूर्ण बहुमत नहीं आता तो एक बार फिर मुख्यमंत्री बदलाव का मौका मिलेगा।

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