अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट पर भले ही गाँधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ रहा है, यहाँ से गाँधी परिवार के करीबी के एल शर्मा केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से मुकाबला कर रहे हैं. स्मृति ईरानी ने पिछले चुनाव में राहुल गाँधी को हराया था. बड़ा शोर था राहुल गाँधी यहाँ से चुनाव लड़ेंगे, कांग्रेस से ज़्यादा भाजपा इस बात को ज़्यादा प्रचारित कर रही थी कि राहुल गाँधी वायनाड से भाग कर अमेठी आएंगे। प्रधानमंत्री मोदी लगातार अपनी चुनावी सभाओं में इस बात का ज़िक्र करते थे और स्मृति ईरानी तो काफी पहले से अमेठी में घूम घूमकर ये बात कहती फिर रही थी, बल्कि एक सभा में तो उन्होंने ये भी कहा था कि राहुल गाँधी अमेठी में नामांकन से पहले अयोध्या जाकर राम लला के दर्शन करेंगे लेकिन भाजपा की ये सारी रणनीति उस समय धराशायी हो गयी जब पता चला कि राहुल गाँधी अमेठी से नहीं रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे और स्मृति ईरानी के लिए वो अपने प्यादे को मैदान में उतार देंगे।
कांग्रेस की इस रणनीति से सबसे बड़ा धक्का स्मृति ईरानी को लगा क्योंकि उनकी पूरी राजनीती ही राहुल के विरोध की रही है, भाजपा राहुल के खिलाफ जब भी कुछ बड़ा हमला करना होता है तो मोदी जी के बाद दूसरा नाम स्मृति ईरानी का ही होता है। स्मृति ईरानी देश में बड़ी से बड़ी घटना पर भले ही कुछ न बोलें लेकिन जहाँ पर राहुल गाँधी का नाम आएगा, स्मृति ईरानी का बयान आना ज़रूरी है. तो अब जबकि अमेठी में किशोरी लाल शर्मा उनके सामने मैदान में हैं लेकिन स्मृति ईरानी नहीं मानती कि उनका मुकाबला के एल शर्मा से है , स्मृति ईरानी का कहना है कि उम्मीदवार भले ही किशोरी लाल शर्मा हों लेकिन मुकाबला उनका प्रियंका गाँधी से है.
दरअसल स्मृति ईरानी अमेठी के चुनाव को राहुल की गैरमौजूदगी में गाँधी परिवार बनाम स्मृति ईरानी बनाना चाहती हैं. उनके सामने सबसे बड़ी दुविधा ये खड़ी हो गयी है कि अगर वो किशोरी लाल शर्मा से चुनाव हार गयी तो बड़ी फ़ज़ीहत होगी। राहुल गाँधी से हार मिलने पर वो बात नहीं होती। राहुल गाँधी कांग्रेस के और देश के बड़े नेता हैं. लेकिन किशोरी लाल शर्मा का नाम अमेठी रायबरेली से आगे शायद ही किसी ने सुना होगा, राजनीतिक पंडितों के अलावा जो रायबरेली और अमेठी के चुनाव को कवर करते रहे हैं. अमेठी में ज़रूर के एल शर्मा को बच्चा बच्चा जानता है क्योंकि वो पिछले 40 वर्षों से यहाँ पर काम कर रहे हैं और गाँधी परिवार के सदस्यों को चुनाव लड़वा रहे हैं, उनके जीतने के बाद उनके प्रतिनिधि बनकर जनता और सांसद के बीच संवाद का काम करते रहे हैं.
स्मृति ईरानी का कहना है कि अमेठी में तो चुनाव प्रियंका गाँधी ही लड़ रही हैं , किशोरी तो एक मुखौटा हैं। अपने भाई को हार से बचाने के लिए उन्हें रायबरेली भेज दिया और खुद अमेठी के चुनावी मैदान में उतर गयी हैं, किशोरी लाल तो पीछे चले गए हैं, उनका काम तो सिर्फ नामांकन भरना था और फिर प्रियंका गाँधी के पीछे पीछे चलना भर है. स्मृति ईरानी काफी गुस्से में आजकल नज़र आती हैं, वैसे उनका गुस्सा जायज़ भी है, एक प्यादे को उनके सामने उतारना एक तरह से वो अपनी तौहीन मान रही हैं। दरअसल स्मृति ईरानी की पहचान ही राहुल गाँधी हैं, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने राहुल गाँधी को उनके ही गढ़ में जाकर हराया, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि 2014 में वो राहुल गाँधी से हार चुकी थी, उनकी हार पर किसी को हैरानी नहीं हुई थी लेकिन 2019 में राहुल गाँधी के खिलाफ उनकी जीत पर ज़रूर सबको हैरानी हुई थी. ऐसे में वो कतई नहीं चाहती कि लोग उनका मुकाबला गाँधी परिवार के प्यादे से करें। वो साफ़ तौर पर कहती हैं उन्हें किशोरी वाली राजनीती से कोई मतलब नहीं, वो बस प्रियंका गाँधी को जानती हैं। अब स्मृति ईरानी के इतना भर कह देने से किशोरी लाल शर्मा की उम्मीदवारी ख़त्म तो नहीं हो जाएगी, उन्हें जीत मिलेगी तो किशोरी लाल शर्मा के खिलाफ और हार मिलेगी तो भी उन्हीं के खिलाफ। स्मृति ईरानी की दिक्कत ये है कि अगर उन्हें अमेठी में जीत मिलती है तो उन्हें कोई मान सम्मान या प्रतिष्ठा नहीं मिलने वाली है लेकिन नतीजा अगर उल्टा हो गया तो एक ही बात सभी के होंठों पर होगी कि प्यादे से हार गयीं। फिलहाल तो अमेठी का चुनाव अपने रंग में है. प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चूका है और यही वजह है कि दोनों ही गठबंधनों का हर बड़ा नेता यहाँ दस्तक दे चुका है या दे रहा है.

