टीकाकरण की धीमी रफ़्तार, क्या करे सरकार?

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टीकाकरण की धीमी रफ़्तार, क्या करे सरकार?

ज़ीनत सिद्दीक़ी

टीकाकरण की धीमी रफ़्तार, क्या करे सरकार?

चंद देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में कोरोना वैक्सीन की कमी है, भारत भी उनमें से एक देश है जहाँ सरकार के तमाम दावों के बावजूद कोरोना वैक्सीन की कमी साफ़ नज़र आ रही है और यह चिंता का विषय है. जब से यह महामारी फैली है और इसने अपने रूप को लगातार विकराल किया है, यह बात स्थापित हो चुकी है कि अभी तक टीकाकरण ही इस महामारी से बचने का एकमात्र उपाय है. वैक्सीनेशन के बिना कोरोना संक्रमण को ख़त्म करना असंभव है, इसलिए टीकाकरण की रफ़्तार को बढ़ाकर साल के अंत तक कम से कम देश की तीस प्रतिशत आबादी को वैक्सीनेट करना ज़रूरी है.

आंकड़ों के हिसाब से अभी तक भारत में 3.1 प्रतिशत लोग पूरी तरह वैक्सीनेट हो चुके है, 23 मई तक 15 करोड़ से ज़्यादा लोगों को वैक्सीन की पहली डोज़ लग चुकी है वहीँ 4.1 करोड़ लोग दूसरी डोज़ भी लगवा चुके हैं. वहीँ अमरीका अपनी 38 प्रतिशत आबादी को वैक्सीनेट कर मास्क से छुटकारा पा चूका है, फिर हमारी चुनौती तो और भी फिर मुश्किल है क्योंकि जनसँख्या और उसके घनत्व के मामले भारत और अमरीका में ज़मीन-आसमान का अंतर है. इसलिए हमें इसके लिए अमरीका से कहीं ज़्यादा प्रयास करने होंगे।

टीकाकरण की धीमी रफ़्तार, क्या करे सरकार?

WHO के प्रमुख भी यही बात कह रहे हैं, टैड्रोस ऐडरेनॉम ने 74वीं विश्व स्वास्थ्य सभा में सदस्य देशों से सितंबर तक कम से कम 10 प्रतिशत आबादी को वैक्सीनेट करने के लिए आग्रह किया और कहा है कि साल के अंत तक कुल आबादी के कम से कम 30 प्रतिशत हिस्से का वैक्सीनेशन ज़रूरी. हमें इस बात को गंभीरता से लेना होगा।

कोरोना की गंभीरता के आंकलन में सरकार से बड़ी चूक हुई हैं, इन चूकों की वजह कुछ भी मानी जा सकती है, चुनावी महत्वाकांक्षा, इमेज बिल्डिंग या फिर कुछ और, यह बहस का अलग विषय है. यहाँ मक़सद सरकार की कमियों पर चर्चा करना नहीं है. पर वैक्सीनेशन को लेकर ग़लत फैसले लिए गए हैं, इसमें दो राय नहीं है. वैक्सीन ही बचाव का एकमात्र तरीका है यह सरकार को पता था, फिर भी सरकार ने लापरवाही दिखाई और समय पर वैक्सीन का आर्डर नहीं दिया जिससे टीकाकरण अभियान में लगातार रूकावट आयी. वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से बात किये बिना 18+ के टीकाकरण का एलान भी कर दिया, परिणाम यह हुआ कि अधिकांश राज्यों में टीके की कमी हो गयी और टीकाकरण केंद्र बंद होने लगे.

वैक्सीनेशन को लेकर एक बड़ी समस्या देश के ग्रामीण क्षेत्रो में आ रही है जहाँ लोगों में टीकाकरण को लेकर बहुत सी शंकाएं हैं. शहरी क्षेत्रों में तो लोग टीकाकरण को लेकर बेहद जागरूक हैं लेकिन उनकी समस्या समय पर रजिस्ट्रेशन के बावजूद टीका न मिलने की है लेकिन गांवों में तो टीकाकरण को लेकर एक डर जैसा है, स्वास्थ्य विभाग की टीम देखकर लोग गाँव छोड़ रहे हैं, नदियों में कूद रहे हैं, खेतों में छुप रहे हैं, सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या है. सरकार को इस समस्या का जल्द से जल्द निवारण करना होगा और गांवों में टीकाकरण के लेकर लोगों में फैले भ्रम और शंकाओं को दूर करना होगा, राज्य सरकारों को भी इसमें केंद्र को पूरा सहयोग देना होगा।

यह बात ध्यान में रखना ज़रूरी कि अगर वैक्सीनेशन की व्यवस्था सुचारु रूप से नहीं चलती है या एक स्थान पर कुछ को लगी कुछ को नहीं तो भी वैक्सीन की प्रभावकारिता प्रभावित हो सकती है. WHO ने आज ही कहा है कि जितनी भी कोरोना वैक्सीन बनी हैं, सभी प्रभावी हैं मगर इस बात की गारंटी नहीं कि वह आगे भी प्रभावी रहेंगी। इसलिए ज़रुरत WHO की गाइडलाइन्स के अनुसार चलने की है नहीं तो वायरस म्यूटेट होकर नित नए रूप धरता रहेगा, कोरोना संक्रमण की लहरों का सिलसिला ऐसे ही जारी रहेगा और लोगों की जानें जाती रहेंगी।

यह बात किसी को डराने के लिए नहीं बल्कि जागरूक करने के लिए है ताकि जनता अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए समय पर टीका लगवाए और कोरोना के प्रकोप से स्वयं की, परिवार की एवं राष्ट्र की रक्षा कर सके, वहीँ सरकार की यह ज़िम्मेदारी है कि वह चुनावी नफा नुकसान और इमेज बिल्डिंग का मोह छोड़कर गंभीरता से इस बात को सुनिश्चित करे कि देश में सबको समय पर टीका मिले। बेशक यह भारत जैसे देश में मुश्किल ज़रूर है पर असंभव नहीं। वैसे भी पिछले सात साल से एक जुमला आम है कि मोदी है तो मुमकिन है, आज ज़रुरत इस जुमले को हकीकत में बदलने की है. क्या कर पाएगी सरकार?

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