अमित बिश्नोई
कम होते उम्मीदवार और सरकता जनाधार, कांग्रेस पार्टी (Congress Party) की यही पहचान बनती जा रही है. हालिया दिनों में पांच राज्यों के चुनाव हुए, इन पांच राज्यों की 690 सीटों पर देश की इस सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे और महज़ 55 सीटों पर ही कामयाबी हासिल कर पाई। यूपी, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब जहाँ पर कांग्रेस की सरकार थी, पिछली बार कुल मिलाकर 142 सीटें हासिल की थीं. पंजाब में 77 सीटों के साथ सरकार बनाई थी, मणिपुर में 28 सीटों के बाद भी सरकार नहीं बना पाए थे और ऐसा ही हाल गोवा में भी हुआ था. मतलब पिछली बार की तुलना में 87 सीटों के साथ एक राज्य का नुक्सान और इस नुकसान की ज़िम्मेदार कोई और नहीं, कांग्रेस खुद है.
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चलिए बात शुरू करते हैं पंजाब (Punjab Assembly Election) से जहाँ पर उसकी सरकार थी. पंजाब में कांग्रेस के पास सिद्धू रुपी एक ऐसा बेलगाम घोड़ा था जिसको अस्तबल में बंद करने की जगह कांग्रेस के आला कमान तमाम विरोधों के बावजूद रेस में अपने अन्य घोड़ों के साथ दौड़ाने पर आमादा रहे और यह बेलगाम घोड़ा अपने साथी घोड़ों पर लगातार दुलत्तियाँ चलाता रहा और घोड़े के मालिक राहुल गाँधी रेस कोर्स के बाहर खड़े तमाशा देखते रहे. इस बेलगाम घोड़े ने न दूसरों को आगे बढ़ने दिया और न ही खुद बढ़ पाया।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक सिद्धू में कांग्रेस का डीएनए है ही नहीं। उनकी बात दमदार है, महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा बने सिद्धू पहले अमरिंदर को तंग करते रहे, हालात ऐसे बने कि कैप्टन साहब को कांग्रेस का हाथ झटकना पड़ा. सिद्धू को लगा कि अब उनके रास्ते का कांटा दूर हो गया मगर पता नहीं कहाँ से चन्नी एक चिंता बनकर सिद्धू के सामने खड़े हो गए. सिद्धू ने एकबार फिर अपनी सरकार और पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, यहाँ तक कि राहुल की मौजूदगी में भी मंच से अपनी पार्टी और सरकार पर हमले करने से नहीं चूके। माना कि आम आदमी पार्टी की पैठ पंजाब बढ़ती जा रही थी मगर हालात ऐसे भी नहीं थे कि जिनपर काबू न पाया जा सके. कोई भी दूसरी पार्टी होती तो सिद्धू को उनकी बद्तमीज़ियों पर फ़ौरन बाहर का रास्ता दिखा देती मगर राहुल ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। वह इस बात के संकेत तो देते रहे कि सिद्धू सीमाएं लांघ रहे हैं मगर उनपर किसी भी तरह की कोई कार्रवाई करने से लगातार कतराते रहे। नतीजा अब सबके सामने हैं, कांग्रेस की कलह पंजाब पर न पड़े इसके लिए पंजाब के लोगों ने कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) पर भरोसा जिताया और कांग्रेस पार्टी से ज़्यादा जताया, साथ ही मौजूदा और पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ CM बनने की चाहत रखने वालों का भी सफाया कर दिया। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी, जनता कहा, अब बनो मुख्यमंत्री।
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पंजाब के बाद उत्तराखंड (Uttarakhand Assembly Election) की बात करते हैं. इस पहाड़ी राज्य में इस बार सबकुछ कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा था, मुख्यमंत्रियों की लगातार बदली कर भाजपा ने यह जता दिया था कि उत्तराखंड में वह संकट में है. एक तरह से कहें तो सबकुछ पका पकाया था. मगर कांग्रेस ने इन परिस्थितियों को taken for granted लिया। सबकुछ वयोवृद्ध हरीश रावत के सहारे छोड़ दिया गया, इस राज्य में अगर दिल्ली से थोड़ी भी मेहनत और हो जाती तो आज उत्तराखंड में कांग्रेस शपथ ग्रहण की तैयारी कर रही होती।
ऐसा ही कुछ गोवा (Goa assembly election) में भी था, यहाँ भी उम्मीद थी कि कांग्रेस पार्टी अच्छा करेगी। लोग सरकार से नाराज़ थे, बदलाव की बातें हो रही थीं और निगाहें कांग्रेस पार्टी की ओर लगी थीं, उन्हें लग रहा था कि कांग्रेस पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनावों से कुछ सबक हासिल किया होगा, तब दिग्विजय जी इंतज़ार ही करते रह गए और भाजपा खेल कर गयी थी, वह छोटी पार्टियां जो कांग्रेस के लिए समर्थन पत्र लिए हुए बैठी थीं, दिग्विजय सिंह के नाकारेपन की वजह से भाजपा को समर्थन देने पर मजबूर हो गयीं।
दरअसल कांग्रेस पार्टी ने अपना सबकुछ यूपी में झोंक दिया, अपनी सारी ऊर्जा यूपी में वापसी के लिए खर्च कर दी, जबकि उसे अच्छी तरह मालूम था कि कुछ भी हो जाय पार्टी को यहाँ पर बहुत कुछ मिलने वाला नहीं। सच बात तो यह है यूपी में कांग्रेस 2024 के लिए ज़मीन बनाने की कोशिश कर रही थी मगर हालात कुछ ऐसे बने थे कि जो ज़मीन पहले से उसके पास थी वह भी काफी सरक गयी. एक ऐसी नेशनल पार्टी जिसने देश के साथ इस प्रदेश में बहुत लम्बे समय तक राज किया सिर्फ दो सीटों पर सिमट गयी जिसमें एक सीट पर सपा (SP) की करमफरमाई रही जो उसने उम्मीदवार नहीं उतारा। कांग्रेस के लिए तो यूपी का चुनाव (UP assembly election) बिलकुल ऐसा रहा जैसे ” नमाज़ माफ़ कराने गए, रोज़े गले पड़ गए. पूरी पाने के चक्कर में आधी भी हाथ से गयी. इससे तो अच्छा होता कि यूपी से आधी ऊर्जा बचाकर गोवा, पंजाब और उत्तराखंड में खर्च करते तो पंजाब भी बच सकता था साथ ही उत्तराखंड और गोवा भी मिल सकता था.
कांग्रेस पार्टी को गंभीरता से सोचना होगा, अपने गिरेहबान में झांकना होगा और यथार्थ पर आंकलन करना होगा। भक्ति के इस दौर में आज भी कांग्रेस के वजूद के बरकरार रहने की कामना करने वालों की एक बहुत बड़ी तादाद है, राजस्थान-छत्तीसगढ़ ही बचे हैं, समय रहते इंतज़ाम कीजिये उन्हें बचाने का और उन राज्यों में जहाँ आज भी भाजपा के सामने कांग्रेस है पार्टी को मज़बूत करने का. लोग विकल्प ढूंढने लगे हैं. केजरीवाल एक और राज्य में पहुँच चुके हैं, ममता पहुँचने की कोशिश कर रही हैं, कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाय. याद रखिये भाजपा और संघ का सपना है कांग्रेस मुक्त भारत का है।

