अमित बिश्नोई
भारत में मरते दम तक एक राजनेता की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं कभी कम नहीं होतीं, सत्ता में होता है तो और ऊपर जाने की महत्वाकांक्षा, सत्ता से दूर होता है तो सत्ता में जल्द से जल्द से वापसी की महत्वाकांक्षा। जैसे जैसे सत्ता से दूरी का काल बढ़ता जाता है वैसे वैसे सत्ता के करीब पहुँचने की छटपटाहट और बेचैनी भी बढ़ती जाती है और नए राजनीतिक परिवेश में तो यह बेचैनी उतना उग्र रूप ले लेती है कि सारी परम्पराएं, सारी लॉयल्टी, सारी वैचारिकता सब ताक़ पे रख दी जाती हैं।
यूपी में भी आजकल कुछ इसी तरह की सरगर्मियां चल रही हैं और इन सरगर्मियों का केंद्र बिंदु समाजवादी पार्टी के संरक्षक सदस्य रहे प्रदेश की मशहूर यादव फैमिली का एक मज़बूत स्तम्भ और अपनी मूल पार्टी से दरकिनार कर दिए जाने वाले प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव हैं. 2017 से यादव फैमिली में मनमुटाव का जो दौर शुरू हुआ वह आजतक जारी है. बीच बीच में इस बात की तथाकथित कोशिशें भी हुईं कि यादव फैमिली फिर से एकजुट हो जाए. अभी संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में इसकी झलक भी दिखी, शिवपाल यादव साइकिल चुनाव चिन्ह से चुनाव भी लड़े, जीते भी, लगा गाड़ी पटरी पर आ गयी है मगर सांसदी छोड़ विधायकी अपनाने और विपक्ष के नेता बनने के भतीजे अखिलेश यादव के फैसले ने गाड़ी को एकबार फिर पटरी से उतार दिया।
चाचा की नाराज़गी फिर बढ़ गयी, उन्हें एहसास हो गया कि चुनाव से पहले “उनका पूरा सम्मान होगा” का वादा भतीजा कभी पूरा नहीं करेगा। हालाँकि शिवपाल को इस बात का एहसास पहले से ही था, 100 सीटों की मांग करने वाले चाचा को भतीजे ने एक ही सीट दी, मगर चाचा ने सोचा चलो आगे देखते हैं, अखिलेश को अपना नेता भी मान लिया। मन मारकर और अपमान का घूँट पीकर अकेले चुनाव लड़े, जीत तो वह तब भी जाते अगर वह अपनी पार्टी प्रस्पा से लड़ते। सिर्फ इस उम्मीद में कि भतीजे ने अभी नहीं तो आगे ज़रूर “पूरा सम्मान” करेगा। हो सकता है भतीजा करता भी मगर भाजपा और जनता ने उसे चाचा का “पूरा सम्मान” करने का मौका ही नहीं दिया। सत्ता वापसी के लिए सौ प्रतिशत आश्वस्त अखिलेश का सपना टूटा और साथ ही शिवपाल का भी.
अब पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसी राजनीतिक घटनाएं जल्दी जल्दी हुई कि सियासी गलियारों में एक शोर सा बरपा हो गया कि बहू के बाद ससुर भी भाजपा की छाँव में जा रहे हैं. इस बात को बल तब मिला जब खबर आयी कि शिवपाल यादव ने सीएम योगी और पीएम मोदी को ट्विटर पर फॉलो किया है, हालाँकि अपने देश के प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर फॉलो करना इस बात की गारंटी नहीं कि वह अपने वैचारिक सिद्धांत बदलने जा रहा है , मगर जो राजनीतिक परिस्थितियां सामने दिख रही हैं उनमें इस तरह के अनुमान लगाना गलत भी नहीं होगा।
प्रसपा नेता शिवपाल ने की मुख्यमंत्री से मुलाकात, अटकलों का बाजार गर्म
कहते हैं बात निकलती है तो फिर दूर तलक जाती है. यह बात भी निकली और अब दूर तलक अनुमान और अफवाहें भी फ़ैल रही हैं. लोग राज्यसभा की बातें भी करने लगे हैं, सच्चाई कितनी है इसके बारे में तो शिवपाल और भाजपा ही बता सकते हैं. फिर भी धुआं तो वहीँ से उठता है जहाँ चिंगारी दबी होती है. ग़ालिब का एक शेर है “बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है”. हालाँकि शिवपाल की बेखुदी का सबब राजनीति के सभी जानकार जानते हैं लेकिन भाजपा से नज़दीकी कितनी बढ़ी है इसपर अभी पर्दा पड़ा है, देखिये कब उठता है?
