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संवेदनशील राजा और ज्वलनशील राज्य


संवेदनशील राजा और ज्वलनशील राज्य

अनूप मणि त्रिपाठी

राजा बहुत शक्तिशाली था। उसने पाला अपने जैसा एक हाथी था। हाथी को खूब प्यार करता। तरह-तरह से लाड़ करता। हाथी मदमस्त रहता। सिवाय राजा के किसी की न सुनता। इधर-उधर आजाद घूमता।

एक दिन की बात है…

हाथी को मस्ती कुछ ज्यादा सूझ गयी। वह घूमते-घूमते राज महल से निकल आया दूर कहीं। पीछे-पीछे उसके सेवक भी भागा। हाथी के सामने खेत फिर आया। खेत देख कर हाथी ललचाया। घुस गया हाथी खेत में । गन्ने पे गन्ना गया उसके पेट में।

‘अरे रोको! रोको!’ ग्रामीणों ने गुहार लगायी।

‘मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा! माफ करो मुझको भाई!’ हाथी का सेवक बेबस हो बोला। उनसे फिर इस भेद को खोला।

‘क्यों! क्यों! क्यों!’ ग्रामीणों ने यही एक सवाल को पूछा।

‘क्या तुम पहचाने नहीं हो इनका मुखड़ा! यही हैं राजा जी के कलेजा का टुकड़ा!’

कोई मदद न मिलते देखी जब । कुछ ग्रामीणों ने उसे रोकने की कोशिश की तब।

हाथी को यह सब बहुत अजीब लगा। फिर क्या था! देखते ही देखते उसने खेतों की फसलों को उजाड़ दिया। एक-एक करके पाँच ग्रामीणों को मार दिया।

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रुका नहीं हाथी अथक प्रयासों के बाद भी। ग्रामीणों का सब्र दे गया जवाब भी। थक हार के सबने राजा के महल में दस्तक दी। महल के पहरेदारों ने उनसे बेअदबी की। खड़े-खड़े कई घण्टे बीते,राजा के पर दर्शन न हुए। अब जाकर ग्रामीण थोड़े उग्र हुए। तब मंत्री जी उनके सम्मुख प्रकट हुए ।

‘हमें राजा से मिलना है! मिल कर उनके राजा बेटा हाथी का काण्ड बताना है और अपना हाल सुनाना है!’ ग्रामीणों के दल का मुखिया हाथ जोड़कर बोला।

‘हो क्या तुम और क्या हो बकते,राजा जी तुम लोगों से अभी मिल नहीं सकते!’ मंत्री ने दो टूक कहा और खखार कर थूक दिया।

‘इतनी बड़ी विपदा आन पड़ी है ,कितनों की जान गई है! आए यहाँ हम इंसाफ की आस में तकते-तकते!और आप कहते हैं कि राजा जी मिल नहीं सकते!’ मुखिया ने हिम्मत जोड़ी। खरी – खरी ही बोल दी ,भले ही थोड़ी – थोड़ी।

‘विपदा तो निःसन्देह बड़ी है! मुश्किल की भी घड़ी है!’ मंत्री सहसा रूआसा हो गया। देखते ही देखते उसका सुर कुछ और हो गया।

‘फिर देर किस बात की है! राजा जी को शीघ्र बुलाइये, और उनको हमारा हाल दिखाइए!’

‘राजा जी बहुत शोक में हैं! बात क्या करेंगे! खुद न वह होश में हैं!’

ग्रामीणों को सुन यह तसल्ली हुई। लगा उनके आने से पहले राजा को खबर पूरी है मिल गई , फिर भी कुछ ग्रामीणों ने पूछ लिया,’क्यों! क्यों!क्यों!’

‘अब क्या कहा जाए! बोले बिन रहा भी न जाए! राजा जी विहार के लिए आज जब जा रहे थे, वहीं रास्ते में एक पिल्ला जी बहुत इत्मीनान से आराम फरमा रहे थे। देखते ही देखते रथ के पहिये के नीचे कुत्ते का पिल्ला आ गया, और हमारे राजा जी को घोर सदमे में डाल गया। तब से राजा जी कुछ न खाये हैं और न पीये हैं, खुद को कक्ष में बंद करके होठ को भी सीये हैं!’ मंत्री ने हृदय विदारक घटना बतायी। सविस्तार सबको चाव से सुनाई।

जिसे सुन कर ग्रामीणों का मुँह खुला का खुला रह गया। एक बुजुर्ग गश खाकर फौरन जमीन पर आ गिरा। उसके मुँह पर मारे गए पानी के छींटे। बुजुर्ग होश में आए आँखें मींचे।

बोले,’ ऐसा संवेदनशील राजा कोई न अन्य हुआ! ऐसा राजा पाकर जीवन हम सबका धन्य हुआ।’
बुजुर्ग अपनी आँखों से आँसुओं को पोछते हुए, आगे हैं बोलते,’और देखिएगा… राजा जी को हमारे बारे में तनिक भी पता न चलने पाए, हमें डर है कि सुन कर हमारी खबर राजा जी मारे सदमे के न मर जाए!’

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घोर अराजनीतिक कथाएं

(1)

एक फकीर बीच सड़क पर बेहोश पड़ा मिला। पुलिस ने जब उसकी तलाशी ली, तो उसके झोले से कई मुखौटे, कई जहर की शीशियाँ और एक तानाशाह की तस्वीर बरामद हुई।
यह घटना लोककल्याण मार्ग पर घटित हुई।

(2)

‘नमस्कार भाईसाहब!’
‘आज रास्ता कैसे भूल गए!’
‘एक बहुत जरूरी काम से आया हूँ!’
‘हाँ कहो!’
‘बिटिया का मिशनरी स्कूल में एडमिशन करना है आपको!’
‘हो जाएगा! डोंट वरी!’
‘धन्यवाद भाई साहब! बहुत बड़ा बोझ हटा!’
‘वैसे,बिटिया का क्या नाम है!’
‘जी, तुलसी!’

(3)

कल मंडी में भारत मिला। मैंने पूछा,’और क्या हाल हैं!’
वह बोला,’कट रही है!’
भारत मेरे मित्र का नाम है।

illustration By Hasan Zaidi

(4)

‘ सुना है शहर में बाघ आया हुआ है!’ कानून अपने हाथों को मलते हुए बोला।

‘अरे यार! चुनाव का समय है, ऐसे में कोई भी आ सकता है…’ व्यवस्था मूंगफली टूंगते हुये बोली।

(5)

‘त से तलवार
नहीं त से तराजू कहो बेटा!’
मास्टर साहब ने अपने बेटे जय को समझाया।
‘पर बाबू जी स्कूल में तो आप सारे बच्चों को त से तलवार रटाते हैं!’ बच्चे ने सवाल किया।
‘बेटा, वो दूसरों के बेटे हैं… ‘ मास्टर साहब मुस्कुराते हुए बोले।

(6)

धर्म संसद चल रही थी। गलती से उसमें एक सांप घुस गया।थोड़ी ही देर बाद वह तेजी से बाहर आया और सांस छोड़ते हुए बोला,’बाप रे बाप!’

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