‘तलाक-ए-हसन’ के मामले में सुनवाई करते हुए देश की शीर्ष अदालत ने आज दो महिलाओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उनके पतियों को नीतिके जारी किया है. बता दें इस्लामी शरिया के मुताबिक ‘तलाक-ए-हसन’ उसे कहते हैं जिसमें तीन महीने में तीन बार तलाक़ दी जाती है. एक बार या दो बार तलाक़ देने से तलाक़ नहीं मानी जाती। इसमें पति द्वारा पहली बार तलाक़ के बाद इस बात की गुंजाईश रहती है कि वह एक महीने में इस फैसले पर दोबारा गौर कर सकता है, इसके बाद अगर बात नहीं बनती है तो दूसरी बार तलाक़ दी जाती है और फिर समझौते की गुंजाईश छोड़ी जाती है लेकिन जब समजाहुते की गुंजाईश बिलकुल ख़त्म हो जाती है तो तीसरे महीने तलाक़ देने के बाद तलाक़ वैध मानी जाती है. याचिका में दावा किया गया है कि तलाक के ये तरीके ‘मनमाने और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं।’ इस मामले की अगली सुनवाई अब 11 अक्टूबर को होगी।
इससे पहले पिछली सुनवाई में जो 16 अगस्त को हुई उसमें ‘तलाक-ए-हसन’ को सुप्रीम कोर्ट ने ज़्यादा गलत नहीं कहा था क्योंकि इसमें एकबार में तीन तलाक़ कहकर रिश्ता ख़त्म करने की बात नहीं है जिसका महिलाऐं शिकार बनती हैं और एक ही झटके में उनका जीवन उजाड़ जाता है.अदालत ने यह भी कहा था कि मुस्लिम महिलाओं के पास भी ‘खुला’ का विकल्प है। जस्टिस एस के कौल और जस्टिस एम एम सुंदरेश की बेंच ने कहा कि अगर पति-पत्नी साथ नहीं रह सकते और अपने इस इरादे पर अटल रहते हैं तो संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तलाक दिया जा सकता है।
पीठ ने कहा था कि शादी एक तरह का करार होने की वजह से आपके पास भी खुला का विकल्प मौजूद है। याचिकाकर्ता बेनजीर हीना की वकील पिंकी आनंद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया था लेकिन उसने तलाक की इस प्रक्रिया पर फैसला नहीं दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने बेनजीर हीना की वकील यह भी पूछा कि आपकी मुवक्किला को ‘मेहर’ से ज़्यादा की रकम का भुगतान किया जाता है तो क्या वह समझौता करने के लिए तैयार होगी। बता दें हीना ‘तलाक-ए-हसन’ की पीड़िता है।

