Happy Eid ul-Fitr 2022- वैसी ही है ईद की मिठास और रवायत

लाइफस्टाइलHappy Eid ul-Fitr 2022- वैसी ही है ईद की मिठास और रवायत

Date:

Zeba Hasan 

भले ही वक्त कितना बदल जाए, लेकिन कई इबारतें ऐसी होती हैं जो कभी नहीं मिटती। कुछ ऐसी ही हैं ईद की रवायतें। घरों से उठती किमामी सेवईं की खुशबू, नये कपड़ों में एक दूसरे को गले लगाते लोग सभी कुछ हर साल सा पुराना, लेकिन एक नई उमंग के साथ। इस बार हमने ईद से पहले कुछ ऐसे ही लोगों से बात की जो अपने बचपन में जिस तरह ईद मनाते थे आज भी अपनी पीढ़ीयों की रवायतों पर ही ईद मनाते हैं।

आज भी बैठते हैं दलान में

तबला वादक नाजिम हुसैन कहते हैं कि जब वालिद यानी उस्ताद बिसमिल्ला खान साहब जिन्दा थे तो बड़े बड़े लोग घर आया करते थे, अब ईद पर भले ही वो हस्तियां ना आएं लेकिन मेहमानों का सिलसिला सुबह से ही शुरू हो जाता है। नामज से पहले कुम्स, जकात देना, नये कपड़े पहनकर ईदगाह जाना सभी कुछ वैसा ही है। पीढिय़ों से चली आ रही हमारी ईद की रवायतें आज भी कायम है आज भी ईद पर हम उसी दलान में जमा होते हैं जहां वालिद के साथ बैठा करते थे।

हमारी ईद पतंग के साथ होती थी

बात बन गई, लंदन के बंधन, कुछ लोग और गाय हमारी माता है जैसी फिल्मों के को प्रोड्यूसर आसिफ झा अपने बचपन की ईद को याद करते हैं तो उन्हें आसमान में उड़ती हुई रंगीन पतंगे याद आती हैं। आसिफ कहते हैं कि उनका पुश्तैनी घर बाराबंकी में था। बचपन वहीं गुजरा है। हमें उस वक्त ईदी में दो रुपए या पांच रुपए मिला करते थे। और पैसे मिलते ही पतंगों की दुकान पर पहुंच जाते थे।

अब वक्त के साथ काफी कुछ बदल गया है। बाजार ज्यादा हावी हो गया है। अब हम पांच सौ रुपए ईदी बच्चों को देते हैं। लेकिन भले ही जमाना जितना बदल गया हो लेकिन मुझे ईद को मनाने की रवातों में कोई फर्क नजर नहीं आता। वही सेवईं की तैयारी, लोगों का आना या फिर हमारा कहीं जाना सभी कुछ वैसा ही है। अब मैं मुम्बई में रहता हूं और फैमिली लखनऊ में। तो अब हर साल ईद लखनऊ में ही होती है।

Also read: Happy Eid ul-Fitr 2022: ईद के चांद की दीद मुबारक

ससुराल की ड्योढ़ी की रस्म निभाती हूं

बेगम इश्रत रसूल बताती हैं कि वैसे तो मैं लखनऊ में रहती हूं, लेकिन ईद मैं संडीला में ही करती हूं। संडीला जलालपुर स्टेट में हमारी कोठी है जहां पिछली सोलह पीढ़ीयों से ऐसी ही ईद मनाई जाती है। सुबह नमाज के बाद लोगों का आना शुरू होता है। मैं कोठी के सहन में रहती हूं और पूरा गांव हमारी कोठी पर ईद मिलने के लिए आता है। सेवईं और पकवान की डेगे रात से ही चढ़ जाती हैं और एक जैसा बांटा जाता है। छोटों को ईदी दी जाती है। यानी मैंने अपनी ससुराल में जिस तरह से ईद मनाते हुए देखा आज भी मैं अपनी ससुराल की डयोढ़ी की रवायत रस्में निभाती हूं।

बस सिर्फ उम्र बदली है

नवाब जाफर मीर अब्दुल्ला ने बताया कि बचपन में वो ईदी लिया करते थे और अब देनी पड़ती है। यानी सिर्फ उम्र बदली है बाकी ईद तो आज भी वैसे ही मनाते हैं। सुबह नहाधोकर नमाज के लिए जाना, लोगों से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देना और आने वाले मेहमानों का सिलसिला। अनानास की सेवई, मुजाफर की सेवई और कई तरह से किमामी सेवईं हमेशा की तरह सुबह ही तैयार हो जाती है। दोस्त और रिश्तेदरों के साथ मिलने का मौका इसी ईद में तो मिलता है।

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related