देश की शांति खतरे में है, क्योंकि बार्डर पर नेताजी डटे हैं
सुनील शर्मा
लो जी लो करलो बात, रस्सी जल गयी मगर बल नहीं गये। देश को बदनाम करने वाले नेताजी पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है, सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, आंदोलन के साथी दामन छोड़ कर नही, दामन पर दाग लगा कर साथ छोड़ चले हैं, बार्डर खाली होने लगे हैं, लंगर-टेंट हटते जा रहे हैं मगर नेताजी हैं कि अब भी सरकार को धमकी देकर अपनी ताकत का अहसास कराने की गलतफहमी पाले हुुए हैं। पुुलिस-प्रशासन की कार्रवाई से परेशान बयान बहादुर नेताजी अब भी किसानों के गांवों में बवाल कराने की धमकी दे रहे हैं। न-न साहब ये मैं नहीं कह रहा ये तो इस देश की भ्रमित जनता कह रही है, किसान कह रहा है, मीडिया कह रहा है जिसे नेताजी के बड़े कद का अहसास नहीं है। वो इत्ते बड़े नेता हैं कुछ भी करा सकते हैं, बानगी तो आपने दिल्ली में देख ली है न साहब।
अब क्या करूं मौसी मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है। चाह कर भी नेताजी की गलती नहीं बता सकता। बेचारे इत्ते अच्छे हैं कि आंदोलन खड़ा करते हैं, मगर उसका नेतृत्व करने का श्रेय कभी नहीं लेते। हमेशा पीछे रहते हैं किसानों और मीडिया के बीच। अब भलमनसाहत तो देखो न इत्ता बवाल हुआ नेताजी कहीं दिखे, नहीं न, वो इसलिये कि वो हमेशा दूसरे को आगे रखना चाहते हैं उनका नाम कराना चाहते हैं। उनका क्या है वह तो फकीर आदमी हैं, न माया का मोह, न मीडिया की चाह। इसलिये नेताजी को गलत न समझना, राजनीति चलाने के लिये बहुत कुछ करना पड़़ता है साहब, कभी सरकार के साथ होना पड़ता है तो कभी साथ होकर भी खिलाफ दिखाना पड़ता है। प्रदेश में आंदोलन शुरू करने से पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री से अकेले में मिलकर भी आना पड़ता है। तो कुछ बातें आप खुद समझ लिजिये मगर नेताजी को गलत न समझना, क्योंकि नेताजी नाराज हैं और देश की शांति अब भी खतरे में है, क्योंकि बार्डर पर नेताजी डटे हैं।
अब नेताजी हैं, गलती मानें तो कैसे, सच स्वीकारें तो कैसे। और वैसे भी अब तक की राजनीति तो किसानों की ताकत और बवाल करा देने की धमकी देकर ही चलाई है। और अब तो वैसे भी खोने के लिये कुछ बचा नहीं है। अब गिरफ्तारी का समय टालने के लिये थोड़ी फूं-फां भी तो जरूरी है। और साहब बड़े नेता पर ध्यान आया कि ये वही नेताजी हैैं जो चुनाव लड़े थे और जीत की बात तो दूर अपनी इज्जत भी नहीं बचा पाये। इन्हीं साहब ने अपने ही क्षेत्र में चक्का जाम का ऐलान किया और चंद जगहों पर, चंद किसानों के साथ, चंद घंटों का प्रदर्शन ही करवा पाये। अब इत्ते बड़े नेताजी की अंगुली भी छूने की हिम्मत सरकार भला कैसे कर सकती है। उनके पीछे तो जनसमूह है जो किसी का दिख ही तो नहीं रहा। है साहब मान लिजिये, चाहे किसानों ने नेताजी को वोट नहीं दिये मगर वही असली नेता हैं किसानों के, वही रहनुमा हैं किसानों के। वो तो किसान अपने प्रिय नेताजी को राजनीति के दलदल से दूूर रखकर हमेशा अपने साथ देखना चाहते हैं इसलिये उन्हें वोट न दिये, वरना मसीहा तो वही हैं।
अब बताओ साहब, इत्ते बड़े नेताजी खुद धरने पर बैठे हैं और सरकार ने बिजली काट दी। अब क्या, नेताजी को गुस्सा आ गया। कह दिया सीधा सरकार से, सारे बार्डर वहीं हैं। ठीक है…और वे किसान जो गांवों में हैं वहां पर उनको बता देंगे। फिर अगर कोई दिक्कत होती है तो वहां के जो लोकल के थाने हैं, किसान वहां पर जाएंगे। ये सरकार पूरी तरह ध्यान रख ले। देख लो नेताजी का बड़प्पन, पहले ही बता दिया कि क्या हो सकता है। बाद में कोई उनसे झूठा दावा करने की बात न कहे और बवाल होगा तो सरकार की ही जिम्मेदारी होगी क्योंकि नेताजी ने साफ तौर पर सबको बता दिया है। अब नेताजी किसी से डरने वाले थोड़े ही हैं और डर गये तो बताने वाले भी नहीं है। अब धमकी दे रहे हैं तो क्या, डरे नहीं है वो और आंदोलन मजबूती से चल रहा है। ये जो किसान बार्डर से हटे हैं न वो तो घर से दूसरे कपड़े, रजाई-गद्दे लेने गये हैं। आ जायेंगे वापस जल्दी आप भी देख लेना, नेताजी तो उनकी राह देखेंगे ही।
और बिजली काट कर सरकार क्या नेताजी को झुका देगी। अरे भाई, जब नेतताजी की एक आवाज पर नये ट्रैक्टरों की लाइन लगवा सकते हैं तो एक बार फिर आवाज देकर वो नये जेनरेटर भी खड़े करवा देंगे। आंदोलन चला रहे हैं, कोई सरकार के भरोसे थोड़े ही बैठे हैं। नेताजी के भी संबंध हैं दूर-दूर तक, पैसा खुद चलकर आता है खाते में हां नहीं तो। सरकार ही कम समझ रही है हमारे नेताजी को अरे वो चाहें तो दिल्ली को अंधेरे में डाल दें औैर चाहें तो खुद सारी दिल्ली में उजियारा कर दें। ये दो महीने से काजू-बादाम ऐसे ही तो न खायें हैं, शरीर में अब भी बहुत गर्मी है नेताजी के।
लेकिन नेताजी हैं बड़े शांतिप्रिय, किसानों से लाठी-डंडा लेकर आने को कहते हैं। अब किसान एक्स्ट्रा डंडा लेकर आ गये तो बताओ उनकी क्या गलती। दिल्ली भर में बवाल हो गया, देश और तिरंगा दुनिया के सामने अपमानित हो गया मगर नेताजी का कोमल हद्य को आंदोलन अब भी शांतिपूर्ण संपन्न दिख रहा है। अब बेचारे हैं ही इत्ते अच्छे की उन्हेें सरकार के अलावा किसी भी बात में गलती दिखती ही नहीं है। तो मेरे बेचारे नेताजी को औैर गुस्सा न दिलाओ, उनके सपने टूट गये, उनका सर्वस्य न्योछावर हो गया। भरे हाथ आये थे अब खाली हाथ लौटना होगा। सफेद दामन पर लगे दाग भी पता नहीं कब छूट पायेंगे। तो भाईजी, मैं तो सरकार से भी यही कहूंगा, मेरे प्रिय नेताजी को माफ करो, कहीं औैर जाकर हाथ साफ करो।

