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खोला साहेब ने पिटारा निकाला कोरोना कर्फ्यू


खोला साहेब ने पिटारा निकाला कोरोना कर्फ्यू

सुनील शर्मा

लो जी लो करलो बात, हम तो सोच रहे थे कि साहेब इस बार कोरोना को मार गिराने को नया जादू चलायेंगे। निकालेंगे झोले में से कोई धांसू सा आईटम जिसे देखते ही कोरोना देश से भाग खड़ा होगा। लेकिन भईया जी ये तो वही बात हुई की खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। साहेब के पिटारे से इस बार भी वही घिसा-पिटा कोरोना (नाइट) कर्फ्यू ही निकला। अरे साहेब, ये जादू तो हम एक साल से देखते आ रहे हैं और देखकर बोर भी हो गये हैं। इस रात के जादू ने न पिछली बार असर दिखाया था और न ही इस बार कुछ कर पायेगा। हां, इस बार कुछ नया लाते तो कोरोना जाता या न जाता, थोड़ा मजा सा तो आ जाता। हां साहेब, हम जानते हैं कि ये सब आपने नहीं किया लेकिन यह भी जानते हैं कि करवाते सब आप ही हैं।

अब देखो ने, साहेब ने पिछले साल कितना मजा बांधा था। कभी ताली बजवाई तो कभी थाली, कभी दिये जलाकर गर्मी में ही दीवाली मनवाई। कोरोना की बात छोड़िये, साहेब के पिटारे से निकली वैरायटी देखिये। हर बार लगता था कि साहेब सारे गम भुलाने के लिये जश्न मनवा रहे हैं। कभी इसका सम्मान तो कभी उसका आदर, बीच-बीच में आने वाले आपको भाषणों से पहले थ्रिलर पिक्चर का संस्पेंस। दिन भर दिल धड़कता रहता था कि शाम को आप क्या और बंद करवाने वाले हैं। अनेकता में एक मंत्र को अपना कर सब अपने घरों में बंद थे फिर भी आपका आदेश आते ही झूमने-गाने लगते। तो साहेब ऐसा ही कुछ और बजवा देते, आपने तो इस बार भी पिछवाड़े पर लठ्ठ बजवाने का ही काम कर डाला। कसम से साहेब, पिछली बार सूजी लेने घर से निकले थे। सूजी को क्या मिलती, आपके पुलिसवाले मिले और हम पिछवाड़ा सूजवा कर घर वापस आये। अब सूजी का हलवा भूलकर हम अपनी सूजी हुई को ही सहलाते रहे।

खैर छोड़ो पुरानी बातें, पुराने जख्म हरे हो जाते हैं और पिछवाड़े में दर्द। लेकिन साहेब, एक बात तो पहले भी समझ नहीं आयी थी और अब तो बिल्कुल ही नहीं आ रही। ये नाइट कर्फ्यू का नाम बदलने से क्या होगा, कोरोना कर्फ्यू में निकलने पर भी हम को-रोना ही तो पडे़गा न। लेकिन साहेब, हम जैसे लोग तो शाम ढलते ही घर में घुसकर बैठ जाते हैं। बाहर निकलें भी तो कैसे, अभी तो पिछले लाॅकडाउन की मार से ही नहीं उबरे। कर्ज में डूबे हुए हैं तो शाम को बाजार जाकर क्या खरीदेंगे और क्या घुमेंगे। पूरे महीने पैसे-पैसे जोेड़कर कुछ खरीदते या एक बार बाहर खाने जाते तो उसपर भी आपने रोक लगाकर हम जैसों पर बड़ा अहसान किया है।

लेकिन साहेब, रात के दस बजे से सुबह के पांच बजे तक घर से निकलेगा ही कौन। रात के अंधेरे में तो वैसे ही भले लोगों को आपके ‘रामराज’ में घर से निकलते हुए डर लगता है। और रात में निकलने वाले बदमाशांे को रोकने की हिम्मत तो पुलिस से लेकर कोरोना तक में नहीं है। तो साहेब बस यह समझा दीजिये की रात में जब सारा बाजार, सारे आॅफिस बंद हों और लोग अपने घरों में सोते हों तो कोरोना फैलता कैसे है। और रात को नहीं फैला तो सुबह को भी रूका रहेगा क्या। पहले तो आपने पूरा लाॅकडाउन ही लगा दिया था तब भी नहीं रूका था कोरोना। और चलो आपने कुछ सोचकर ही लगाया होगा कोरोना कफ्र्यू लेकिन क्या सच में इससे कोरोना रूक जायेगा।

अच्छा साहेब, आपने वैक्सीन बनवाई, वाहवाही लूटी और फिर बांट दी और देशों में। तो साहेब, माना की आप दानवीर हैं तो अपने ही कवच-कुंडल दे देते, अपने ही देश की जनता का हक क्यों मारा। टीका बनवाने में जो रिसर्च हुई उसका पैसा दिया देशवासियों ने, चूहा बनकर खुद पर वैक्सीन का टैस्ट करवाया हमारे देश के लोगों ने, जो टीका फ्री में आप बांट रहे हैं उसका खर्च भी वसूला जायेगा देश के ही लोगों से, तो टीके पर पहला हक भी तो हमारे देशवासियों का ही बनता है न। तो पहले अपनों का ही लगावा देते टीका तो क्यों हमें पड़ता को-रोना। लेकिन साहेब, आपने तो वो ही बात कर दी के ‘सबको बांटे और अपनो को डांटे’। अब टीका कराने जाते हैं तो वहां भीड़ देखकर डर लगता है। पता चला कि एंटीबाॅडी तो बनी नहीं और वहां से कोराना बाॅडी लेकर वापस आ गये। पैसे देकर भी राशन की तरह मिल रहा है अपने ही देश का टीका। और दूसरे देश वाले हमारा टीका लगवा कर आपके जयकारे लगा रहे हैं।

अरे साहेब, ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है। जानती है कि अब आपके पास करने को कुछ नहीं है फिर भी कुछ तो करके दिखाना ही था। काम न करो तो काम का जिक्र जरूर करो, और जिक्र भी न करो तो फिक्र जरूर करो। तो साहेब, आपने हमारी फिक्र कर यह तो जता ही दिया कि आप हमारा कितना ध्यान रखते हैं। लेकिन साहेब, वो बंगाल और केरल वाले भी तो अपने ही भाई हैं। थोड़ा सा ध्यान उन पर भी रखें, थोड़ी कृपा उनपर भी बरसायें तो उनको भी अच्छा लगेगा। जब सारे देश को नाइट कर्फ्यू, बकौल आपके कोरोना कर्फ्यू का जादू दिखा ही रहे हैं तो थोड़ा हक उनका भी तो बनता है। वो बात ठीक है कि आपकी कृपा से वहां कोरोना की जाने की हिम्मत नहीं हो रही लेकिन उन्हें देश की कोरोना धारा से यूं काटना भी तो उचित नहीं है। तो साहेब, चुनाव की मजबूरी हम समझते हैं लेकिन देखियेगा चुनाव के बाद उनको घर पर आराम करने की व्यवस्था जरूर करा दीजियेगा। कुछ दिन घर में रहेंगे तो सारी थकान भी मिट जायेगी और वो कोरोना धारा में वापस भी आ जायेंगे। साहेब, कोरोना जाये या न जाये मगर यकीन मानिये इससे आपके यश-गान में वृद्धि जरूरी होगी, जो आपकी पहली जरूरत भी है…

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