Political News: भाजपा के विषय में यह चर्चा है कि 2014 से ही पूरी पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के आसपास केंद्रित हो गई है। अनजानी रणनीति के अंतर्गत पार्टी ने राज्यों में प्रभावी नेतृत्व विकसित नहीं किया और पार्टी का पूरा चुनावी अभियान पीएम नरेंद्र मोदी के आसपास सिमटा रहा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की माने तो कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम ने यह बता दिया है कि ‘हिंदुत्व का एजेंडा’ और ‘पीएम नरेंद्र मोदी की छवि’ कोई भी चुनाव जीतने के लिए काफी नहीं है। आरएसएस का मानना है कि किसी भी राज्य में चुनाव जीतने के लिए वहां मजबूत स्थानीय नेतृत्व को अहम कारक होना चाहिए। माना जा रहा है कि संघ ने भाजपा को राज्यों में मजबूत स्थानीय नेतृत्व पैदा करने और वहां के विकासवादी राजनीति को अपनाने की सलाह दी है।
हिंदुत्व और ब्रांड मोदी को लेकर संघ चिंतित
हिंदुत्व और ब्रांड मोदी को लेकर संघ की चिंता बढ़ रही है। संघ की इस चिंता का एक कारण ये भी है कि क्या हिंदुत्व और मोदी ब्रांड के भरोसे किसी भी राज्य का चुनाव जीता जा सकता है? संघ ने चिंता जताई है कि क्या भाजपा में अब राज्यों का चुनाव जिताने की क्षमता बाकी नहीं बची? लोकसभा चुनाव 2024 के पहले भाजपा चुनावी तैयारियों में जुटी है और अपनी जीत को अमली जामा पहना रही है। लेकिन भाजपा की इस तैयारी के बीच संघ की नसीहत बहुत मायने रखती है। इसे भाजपा को समझने की जरूरत है।
स्थानीय नेतृत्व दरकिनार 2014 से पूरी पार्टी पीएम मोदी पर केंद्रित
2014 के बाद से जितने भी राज्यों में चुनाव हुए हैं वहां पर BJP स्थानीय नेतृत्व दरकिनार किया गया और पूरी भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के आसपास केंद्रित होकर रह गई है। भाजपा अपनी इस अनजानी रणनीति के तहत राज्यों में प्रभावी नेतृत्व नहीं तलाश पाई। 2014 के बाद राज्यों के चुनावी अभियान पीएम नरेंद्र मोदी के आसपास सिमटकर रह गए। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा में भाजपा का ये दांव सफल साबित हुआ। इसका कारण था इन राज्यों में स्थानीय नेतृत्व मजबूत रहा। जिसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर जमकर वोट पड़े। इन राज्यों में अभूतपूर्व बहुमत से भाजपा की सरकारें बनीं।
अन्य राज्यों में मोदी कार्ड फेल साबित हुआ
इन राज्यों के चुनाव के बाद कुछ समय बाद जब दूसरे राज्यों में चुनाव हुए तो मोदी कार्ड अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। जिसके फलस्वरूप भाजपा को पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में करारी हार का सामना करना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आक्रामक चुनाव प्रचार विपक्षी दलों के मजबूत स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय करिश्मे के सामने धराशाही हो गया।
भाजपा के एक नेता ने ने बताया कि पार्टी ने लंबे समय से प्रदेश में कोई बड़ा नेता नहीं पनपने दिया है। ना ही किसी नेता को राज्य स्तर पर उठाने की कोई कोशिश की गई। इसी का परिणाम हुआ कि उसे सत्ता में आने के लिए नीतीश कुमार का सहारा लेना पड़ा। इसका दुष्प्रभाव हुआ कि भाजपा को प्रदेश में अपने बूते चुनाव जीतने और सत्ता में आने योग्य नहीं बन पाई।
प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात में उनके और अमित शाह के अलावा कोई नेता ऐसा नहीं है जो अपने कंधे पर भाजपा को चुनाव जिता सके। स्थानीय नेतृत्व की यह कमजोरी कई राज्यों में देखी जा सकती है।
स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा से संघ नाराज
कर्नाटक में भाजपा ने अपनी हार सुनिश्चित करने की रणनीति बना ली थी। राज्य के मतदाताओं का स्वभाव है कि उन्होंने हमेशा से राष्ट्रीय नेतृत्व की जगह स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता दी है। इस सच को जानते हुए लगातार लिंगायत नेता येदियुरप्पा को दरकिनार किया। जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी जैसे जिताऊ जमीनी नेताओं का टिकट काट कर उन्हें उपहार के तौर पर कांग्रेस की झोली में डाल दिया। भाजपा के कार्यों का वही परिणाम होना था जो हुआ। बड़ा प्रश्न है कि भाजपा नेतृत्व ने इस तरह की रणनीति क्यों अपनाई?
चर्चा है कि भाजपा नेतृत्व की स्थानीय नेतृत्व की गहरी उपेक्षा से संघ में नाराजगी है। कर्नाटक में संघ की मेहनत पर पानी फिर गया। कर्नाटक की हार केवल एक हार तक सीमित नहीं है। इसके जरिए आरएसएस की जिस विचारधारा को दक्षिण में धार देने की मेहनत की गई थी वह चुनावी हार से लंबे समय के लिए कुंद पड़ती दिखाई दे रही है।
हिंदुत्व और ब्रांड मोदी सवालों के घेरे में?
हिंदुत्व का मुद्दा संघ और भाजपा के वैचारिक दांव है। आज भी भाजपा अपने इसी एजेंडे के सहारे अन्य राज्यों में आगे बढ़ रही है। लेकिन जिस तरह पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में हिंदुत्व के बल पर चुनावी सफलता नहीं मिली इसको लेकर अब चर्चा होने लगी है। राजनीतिक विश्लेषक की माने तो किसी चुनाव को जीतने का कोई एक अकेला फॉर्मूला नहीं होता।
एक चुनाव में अलग-अलग मतदाता अलग-अलग कारणों से वोट करते हैं। किसी राजनीतिक दल को मतदाताओं की रुचियों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग वादे करने पड़ते हैं। भाजपा की बात की जाए तो हिंदुत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी बड़े ट्रंप कार्ड हैं।
लेकिन बदलते हालात में भाजपा को नई योजनाओं के साथ चुनावी मैदान में आने की जरूरत है। संघ ने इसी बात की ओर इशारा किया है कि अब इन्हीं मुद्दों के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता। भाजपा को अपने तरकश में नए तीर डालने की जरूरत है। विशेषकर ऐसे माहौल में जब विपक्ष अपनी एकता और राज्य राजनीति के सहारे पीएम को घेरने की रणनीति पर चल रहा है। ऐसी में रणनीति की जरूरत बढ़ जाती है।
