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रूह में ताजगी भरने वाला रूह अफजा ने भी देखा है बंटवारे का देश

Zeba Hasan

कांच के गिलास में घुला हुआ गहरे लाल रंग का शर्बत देखते ही, एक नाम जेहन में आता है रूह अफजा। रूह अफ्जा महज शर्बत नहीं बल्कि एक ऐसा ब्रांड है जो इतिहास का गवाह भी है। 1906 में हिकमत के लिहाज से ईजाद किया गया रूह अफजा ने साफ्ट ड्रिंक के तौर पर ऐसी जगह बनाई की इंदिरा गांधी, नेहरू जी से लेकर दिलीप कुमार और सायरा बानो का पसंदीदा शर्बत बन गया था। रमजान का इफ्तार हो, मोहर्रम में लगने वाली सबीलें या फिर बड़े मंगल पर हनुमान जी के नाम पर लगने वाला भंडारा। भक्तों को सेराब करने के लिए भी रूह अफजा ही पहली पसंद होती है। रमजान के इस मौके पर हमने रूह अफजा के ऐतिहासिक सफर के बारे में जानने की कोशिश की।

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पुराना है इतिहास

चौक स्थित हमदर्द दवाखाने पर काम करने वाले मोहसिन इमाम बताते हैं कि रूह अफजा की बिक्री तो पूरे साल ही होती है लेकिन रमजान में इसकी डिमांड चार गुना बढ़ जाती है। वह कहते हैं कि इस शर्बत का पुराना इतिहास है। 1906 में हकीम अबदुल हमीद ने दिल्ली में हमदर्द यूनानी दवाखाना खोला था। इसके खुलने के एक साल बाद यानी 1907 में रूह अफजा का लॉन्च किया। शीशे की बोतलों में आने वाले इस शर्बत का लोगो मुम्बई से बनकर आया था। इसमे तमाम जड़ी बूटिंया, फलों का रस, संदल को मिलाकर तैयार इस शबर्त को पीते ही लोगों की रूह भी ताजा हो जाती थी। फिर क्या था देखते ही देखते हर घर की पसंद बन गया था रूह अफजा । इसका नाम लखनऊ के पंडित दया शंकर नसीम की किताब ‘मसनवी गुलजार ए नसीम’ से लिया गया था जिसमे एक किरदार का नाम रूह अफजा था।

पाकिस्तान से भी आता है रूह अफजा

चांवल वाली गली स्थित मोहम्मद डेट्स के इकलाख कहते हैं कि रमजान में पाकिस्तान से भी रूह अफजा की सपलाई यहां पर होती है। पाकिस्तान केसे पहुंचा रूह अफजा? दरअसल 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो हकीम परिवार के एक सदस्य हकीम अबदुल सईद पाकिस्तान चले गए थे। जहां पर उन्होंने हमदर्द पाकिस्तान की स्थापना की। इस तरह से रूह अफजा ने पाकिस्तान तक का सफर तय कर लिया था। इसके बाद तो बंगला देश और भी कई देशों में इस शर्बत ने लोगों के दिलों में मिठास घोली।

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एक वक्त में सेल्फी लेते थे लोग

इस शर्बत ने सालों साल लोगों के दिलों पर एकछत्र राज किया। शादी से लेकर सियासी महफिलें, फिल्मी पार्टियां सभी जगह इस लाल शर्बत का ही जलवा था। लेकिन एक ऐसा दौर भी आया जब रूह अफजा लोगों की पहुंच से दूर हो गया था। दरअसल हकीम हाफिज अब्दुल मजीद के दो बेटे थे। अब्दुल हमीद और मोहम्मद सईद। दोनों पिता के इस व्यवसाय में हाथ बटाते थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद हमदर्द कंपनी भी दो हिस्सों में बंट गई। मोहम्मद सईद पाकिस्तान चले गए। जबकि बड़े बेटे अब्दुल हमीद मां के साथ हिंदुस्तान में ही रह गए। अब्दुल हमीद की नई पीढ़ी में कुछ विवाद हुए जिसका असर रूह अफजा के प्रोडक्शन पर हुआ। हालांकि इसे कोरी अफाह बताया गया था। लेकिन मार्केट से रूह अफजा गायाब हो चुकस था। यहां तक जिसे एक बोतल मिल जाती थी वह सेल्फी लेकर बहुत गर्व से पोस्ट करता था। हालांकि अब मार्केट में रूह अफजा का जलवा बरकरार है। 150 रुपए की बोतल हरघर का हिस्सा बन रही है। इफ्तार में कोई दूध में डाल कर कोई पानी में घोल कर तो कोई आईस्क्रीम बनाकर इसका इस्तेमाल कर रहा है। 

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