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Global Warming: समुद्र तल की बढ़ती ऊंचाई गंभीर संकट, मुंबई और कोलकाता की आबादी प्रभावित

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नई दिल्ली। ग्लोबल वार्मिग के कारण तेजी से समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ रही है। यह आबादी के लिए गंभीर संकट है। इससे भारत के मुंबई और कोलकाता के अलावा तटीय राज्य प्रभावित होंगे। इससे भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, नीदरलैंड्स और चीन की बड़ी आबादी प्रभावित होगी। बड़ी आशंका यह है कि समुद्र तटीय क्षेत्रों में जलस्तर बढ़ने से लोग पलायन करने के लिए मजबूर होंगे।

अरबों लोगों के सामने पैदा होगा गंभीर संकट

इससे दूसरे क्षेत्रों में भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस वर्ष सुरक्षा परिषद की बैठक की शुरुआत करते हुए कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ने से दुनिया के अरबों लोगों के सामने गंभीर संकट पैदा हो सकता है। इस संकट से समुद्र तट के आसपास के लोगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित होगा।

पैदा हो सकता है अन्न और जल का संकट

समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ने से कई अन्न उत्पादक क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे, इससे दुनिया के शेष हिस्सों में भी अन्न उपलब्धता का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। यह करोड़ों लोगों के सामने भुखमरी का संकट पैदा कर सकता है। क्या इस गंभीर स्थिति को रोकने में विश्व समुदाय सक्षम है?

मुंबई-कोलकाता जैसे महानगरों की आबादी होगी प्रभावित

भारत की कुल समुद्र तटीय सीमा लगभग 7516.6 किमी है। इन तटीय क्षेत्रों में आबादी का बड़ा हिस्सा रहता है। जलस्तर बढ़ने से इन समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग बुरी तरह प्रभावित होंगे। विशेषकर मुंबई-कोलकाता जैसे बड़े शहरों की बड़ी आबादी इससे प्रभावित होगी। इन क्षेत्रों में रोजगार और अन्न उत्पादन पर असर पड़ने से शेष भारत पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा।

पाकिस्तान और चीन पर भी पड़ेगा असर

भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, नीदरलैंड्स और चीन की बड़ी आबादी भी प्रभावित होगी। बड़ी आशंका यह है कि समुद्र तटीय क्षेत्रों में जलस्तर बढ़ने से लोग सुरक्षित क्षेत्रों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर होंगे। इससे दूसरे क्षेत्रों में भी साफ पानी, आवास और भोजन की उपलब्धता पर दबाव बढ़ेगा। इससे कई देशों के सामने सामना न कर सकने योग्य परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।


हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र तल में यह ऊंचाई अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है। इससे इन क्षेत्रों में पड़ने वाले सीधे प्रभाव भी कम-अधिक होंगे। लेकिन इसके दूरगामी असर से दुनिया का कोई क्षेत्र अछूता नहीं रहेगा। इसलिए पर्यावरण विशेषज्ञ सभी देशों और समुदायों से इस त्रासदी को टालने में साथ आने की अपील कर रहे हैं।

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