कांग्रेस का निमंत्रण ठुकराना

आर्टिकल/इंटरव्यूकांग्रेस का निमंत्रण ठुकराना

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अमित बिश्नोई

कांग्रेस पार्टी ने आखिरकार काफी मंथन के बाद अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया, साथ ही देश में इस बहस को भी छेड़ दिया है कि कांग्रेस को राम लला की प्राण प्रतिष्ठा में जाना चाहिए या फिर उसने न्योता ठुकरा कर सही निर्णय लिया है. कांग्रेस पार्टी के लिए राम मंदिर के कार्यक्रमों में जाने का न्योता ठुकराना कोई आसान निर्णय नहीं था और शायद यही वजह है कि ये फैसला लेने में उसे 15-20 दिन का समय लगा. अब उम्मीद के मुताबिक भाजपा इसे एक चुनावी मुद्दा बनाने में लगी हुई है और भाजपा ने अभी पार्टी के सेकंड लाइन नेताओं को इस काम में लगाया गया है , फ्रंटलाइन के नेता अभी अपने को इस मुद्दे से दूर रखे हुए हैं. वो जानते हैं कि देश में जब राम लहर चल रही है, पूरा देश राम के आगमन और उनके प्राण प्रतिष्ठा की तैयारी कर रहा है ऐसे में इस मुद्दे को लेकर अभी कांग्रेस पर हमला करना ठीक नहीं , इसके लिए 22 जनवरी के बाद देखा जायेगा।

भाजपा को अच्छी तरह मालूम है कि कांग्रेस के इस फैसले को वो चुनाव में अच्छी तरह भुना सकती है, उसे ये भी मालूम था कि कांग्रेस कभी भी इस समारोह का निमंत्रण स्वीकार नहीं करती। क्योंकि इस समारोह पर भाजपा और आरएसएस की छाप लगी हुई है, प्रधानमंत्री मोदी हर हाल में इस छाप को बरकरार रखना चाहते हैं, उन्हें राम से कितना लगाव है वो दुनिया को बार बार बता चुके हैं और आज भी बता रहे हैं, आज उन्होंने प्राण प्रतिष्ठा के लिए विशेष अनुष्ठान शुरू कर दिया है, वो 22 जनवरी व्रत रखेंगे, शास्त्रों के नियमों का पालन करेंगे। लोगों को इसमें कोई हैरानी नहीं हुई. राम मंदिर तो प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक संजीवनी की तरह है. इसी के सहारे वो मज़बूती के साथ केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हैं. उनके पास राम भक्तों का आज एक इतना बड़ा वोट बैंक है जो उन्हें हर राजनीतिक तूफ़ान से निकालने के लिए तैयार रहता है.

कांग्रेस पार्टी का अयोध्या न जाने का फैसला भी कोई अनहोना नहीं है. भाजपा कांग्रेस को हिन्दू विरोधी बता रही है, वो तो हमेशा बताती रही है, हिन्दू धर्म पर उसने पेटंट जो करा रखा है. राहुल प्रियंका के मंदिरों में जाने पर उसे परेशानी हो जाती है, भाजपा के नेता उसे चुनावी हिन्दू कहते हैं. लेकिन कांग्रेस ने हमेशा धर्म को राजनीति से दूर रखा है हालाँकि हाल के दिनों में उसका चेहरा बदला है, हार्ड हिंदुत्व तो नहीं सॉफ्ट हिंदुत्व का रूप तो उसने अपनाया ही है, हालाँकि उसका उसे कोई फायदा मिलता हुआ नहीं दिखा। कमलनाथ ने मध्य प्रदेश के चुनाव में खुद को पूरी तरह हिंदुत्व के रंग में रंग लिया मगर वोट उसे ही मिला जिसके पास पेटेंट था.

दिलचस्प बात तो ये है कि राम मंदिर के लिए अगर किसी को श्रेय दिया जाना चाहिए तो कांग्रेस को दिया जाना चाहिए। चाहे ताला खुलवाने की बात हो या शिलान्यास की बात, राम मंदिर की आधारशिला तो कांग्रेस ने ही रखी मगर राजनीतिक विवशताओं के चलते कांग्रेस राम मंदिर पर अपना पेटेंट न करा सकी और भाजपा ने उसे हाईजैक करके राजनीतिक रूप से खूब फायदा उठाया। रथयात्रा के सारथियों में से एक नरेंद्र दामोदार मोदी आज सारथी से मुख्यमंत्री बनते हुए प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हैं. कांग्रेस पार्टी अपने इस निर्णय के बचाव में सिर्फ इतना ही कह पा रही है कि ये मंदिर अर्धनिर्मित है जिसका उद्घाटन भाजपा और आरएसएस चुनावी फायदा हासिल करने के लिए कर रहे हैं ये भाजपा और आरएसएस द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम है और इसीलिए वो ससम्मान प्राण प्रतिष्ठा का ये न्योता अस्वीकार कर रही है। कांग्रेस पार्टी इस न्योते पर इससे ज़्यादा और कुछ कह भी नहीं सकती थी. उसका इस कार्यक्रम में जाने का मतलब यही होता कि भाजपा सही है और कांग्रेस गलत. कांग्रेस फिर किस मुंह से भाजपा पर धर्म की राजनीति करने का आरोप लगाती। आप इसे कांग्रेस की मजबूरी समझ सकते हैं, बहुत से लोग ये भी कह रहे हैं कांग्रेस का ये फैसला राजनीतिक है, तो राम मंदिर का ये आयोजन भी तो भाजपा का हथियार है. जिस दिन सुप्रीम का फैसला राम मंदिर के पक्ष में आया उसी दिन लोगों को ये मालूम हो गया था कि इसका उद्घाटन चुनाव के समय ही होगा। तो कांग्रेस के इस फैसले पर राजनीति का स्टिकर लगाना तो बेकार की बात है. दरअसल राम मंदिर का उद्घाटन कांग्रेस के लिए आगे कुंआ पीछे खाई वाली बात है, वो कोई भी फैसला लेती उसे नुकसान ही होता, फैसला सिर्फ इस बात का करना था कि नुकसान कुंएं में कूदने में ज़्यादा है या खाई में. अब इसका फैसला आप ही करें कि कांग्रेस ने राम मंदिर समारोह का न्योता अस्वीकार कर खुद को कुँए में ढकेला है या खाई में.

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