सेना में नई भर्ती योजना के बारे में अब साफ़ हो चूका है कि लाख विरोध के बावजूद यह योजना वापस नहीं होगी, यह अलग बात है कि इस बात की घोषणा सरकार के बजाय सेना प्रमुखों को करना पड़ा. यह भी अपने आप में ऐतिहासिक है कि सरकार द्वारा लाइ गयी किसी योजना का बचाव प्रेस कांफ्रेंस के ज़रिये सेना प्रमुख कर रहे हैं. योजना वापस नहीं होगी इसका एलान तो उसूलन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को करना चाहिए थी लेकिन सरकार ने इसके लिए सेना प्रमुखों को चुना, शायद सरकार यह सोच रही होगी कि उसकी जगह आक्रोशित जवान सेना प्रमुखों की बातों को ज़्यादा वज़न देंगे मगर सवाल यह है कि क्या सेना प्रमुखों की बातों को आंदोलित युवाओं ने वो वज़न दिया, शायद नहीं, वरना आज भारत बंद का कॉल न होता।
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कल हुई प्रेस कांफ्रेंस में सेना प्रमुख एक तरफ तो कहते रहे कि सेना में हिंसा करने वालों की कोई जगह नहीं, हिंसा करने वालों को सेना में नौकरी नहीं मिलेगी, पुलिस उनका वेरिफिकेशन नहीं करेगी, एक तरह से अपरोक्ष रूप से वार्निंग देने वाली भाषा का इस्तेमाल। सेना प्रमुखों का यह कहना कि दो साल से अधिक समय से इस योजना पर काम चल रहा था, इसके हर पहलु पर बारीकी से गौर करने के बाद ही यह योजना लाइ गयी मगर जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या योजना बनाते समय इस तरह की प्रतिक्रिया आ सकती है तो सेना प्रमुखों ने मामला लॉ एंड आर्डर पर टाल दिया, मतलब सरकारें जानें।
इस प्रेस कांफेरेंस की एक और महत्वपूर्ण बात जिसपर मीडिया में काफी बहस चल रही है वो है कि सेना प्रमुखों का पूरी प्रेस कांफ्रेंस के दौरान बार बार इस बात को दोहराना कि आरक्षण देने का तीन दिन के बाद एलान करना उनके प्लान का हिस्सा था न कि योजना के एलान के बाद हुई हिंसक घटनाओं के दबाव में आकर ये फैसला किया गया. यह बात भी अपने आप में बड़ी अजीब सी लगती है कि जब आरक्षण देने का फैसला पहले ही ले लिया गया था तो फिर उसका एलान योजना की घोषणा के साथ ही क्यों नहीं किया गया. क्या इस बात का उन्हें अंदाजा नहीं था कि सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवा ऐसी किसी भी योजना से भड़क सकते हैं. हालाँकि सेना प्रमुखों ने भी माना कि ऐसी प्रतिक्रिया के बारे में नहीं सोचा गया था.
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बात फिर वहीँ आ जाती है कि आरक्षण योजना का पहले से ही हिस्सा था इसकी घोषणा ने सरकार के किसी नुमांइदे ने सामने आकर क्यों नहीं किया, सेना के द्वारा क्यों कराया गया. क्या सरकार को अपने पर विश्वास नहीं रहा था कि आक्रोशित नौजवान उनकी बातों पर भरोसा नहीं करेगा, भरोसा तो उसने सेना प्रमुखों की बात का भी नहीं किया। तो क्या यह मान लिया जाय सरकार ने सेना का भी सम्मान घटाया। सेना का सम्बन्ध सिर्फ भर्ती की प्रक्रिया सा था न कि योजना अच्छी है या बुरी है, युवाओं को कौन भड़का रहा है, आरक्षण का फैसला कब लिया गया, इससे। सेना भर्ती में बदलाव या प्रधानमंत्री मोदी की भाषा में रिफार्म का फैसला तो केंद्र सरकार का था, तो योजना पर उठ रहे सवालों का जवाब लेकर सरकार को सामने आना चाहिए था. सेना के सरकार द्वारा इस तरह इस्तेमाल को हरगिज़ सही नहीं ठहराया जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी जी ने आज बंद अल्फ़ाज़ों में अग्निपथ पर मचे बवाल पर कहा कि कई फैसले शुरुआत में गलत लग सकते हैं लेकिन बाद में उनका काफी फायदा होता है. प्रधानमंत्री यही बात सामने आकर पहले भी कह सकते थे, युवाओं से सीधे संवाद कर सकते थे और नहीं तो मन की बात करके योजना के बारे में समझा सकते थे.

