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अल्लाह से यह कहती थीं जन्नत में फात्मा, बच्चे मेरे यतीम हुए हैं दुहाई है…

Zeba Hasan 

सुबह के तीन बजे से लोग नंगे पांव पुराने लखनऊ स्थित रोजा-ए-नजफ की तरफ चले जा रहे थे। मौला हजरत अली के सोगवार अपने इमाम की शबीह (ताबूत)की झलक देखने के लिए दूर दूर यहां पहुंच रहे थे। यह मौका उन्हें कोरोना महामारी की वजह से दो साल बाद मिला था। शनिवार, सुबह की आजान होते ही मौलाना (धर्म गुरु) ने मजलिस में रो रो कर मौला की शहादत को बयां किया। मजलिस खत्म होते ही चारों तरफ से या अली की आवाजें गूजने लगीं। हजारों की तादाद में मौजूद पुरुष, महिलाएं और बच्चे बस रोकर अपने मौला को अलविदा कह रहे थे। गम और अकीदत के माहौल में जैसे ही ताबूत बाहर आया महौल पूरी तरह से गमगीन हो गया। ताबूत आगे चला तो लोग ताबूत के साथ-साथ करबला की तरफ चल पड़े।

Image Credit: Naeem
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हजरत अली की याद में उठता है 21 रमजान का जुलूस

पैगम्बर मौहम्मद मुस्तफा के दामाद और शिया समुदसय के पहले इमाम मौला-ए-कायनात हजरत अली इब्ने अबुतालिब की शहादत की याद में 21 रमजान का ताबूत ग़म और अकीदत के साथ निकला। सुबह की अजान के बाद रुसतम नगर स्थित रौजा-ए-नजफ से निकलने वाला यह ताबूत हजारों चाहने वालों के साथ हर साल की तरह अपने तय समय पर करबला तालकटोरा पहुंचा। नौबस्ता, टूरियागंज, एवररेडी चौराहे से गुजरने वाले ताबूत की जियारत के लिए जगह जगह लोग खड़े रहते हैं। चादरें चढ़ती हैं लोग रोकर अपने इमाम को आखिरी विदा देते हैं। रास्ते में पानी पीलाने के लिए सबीलों का इंतजाम भी होता है। जो बुजुर्ग और बच्चे रोजा नहीं होते वह इन सबीलों पर मौला के नाम पर पानी पीते हैं।

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152 साल पुराना इतिहास है ताबूत का

21 रमजान को उठने वाले इस ताबूत को हसन मिर्जा के ताबूत के नाम से भी जाना जाता है। रुस्तम नगर वासी हसन मिर्जा से ही 1870 में इस ताबूत की शुरुआत की थी। 152 साल से अकीदतमंद इस एतिहासिक ताबूत को पुरानी रवायतों के साथ उठा रहे हैं। हालांकि ऐसा पहली बार हुआ था जब कोरोना महामारी के चलते दो साल इस ताबूत को नहीं उठाया गया। यही वजह थी कि इस बार लखनऊ के बाहर से भी काफी लोग इस ताबूत में शिरकत करने के लिए आए हुए थे। दिल्ली से आए नौशाद कहते हैं कि तीन साल पहले हम इस ताबूत की जियारत के लिए आए थे। फिर दो साल कोराना ही चला। इस बार हम पूरी फैमिली के साथ सिर्फ इसी ताबूत की जियरत करने के लिए आए हैं।

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तीन दिन चलता है गम का सिलसिला

उल्लेखनीय है कि 19 रमजान को सुबह की नमाज़ पढ़ते वक्त मौला-ए-कायनात हजरत अली अलैहिस्सलाम के सर पर इब्ने मुलजिम ने ज़हर बुझी तलवार से वार किया था। जिसकी वजह से मौला अली 21 रमजान की सुबह शहीद हो गए थे।रमजान की 19 को भी एक कदीमी ताबूत निकलता है जिसे गिलीम का ताबूत (कम्बल वाला ताबूत) कहा जाता है। काजमैन से उठकर पाटानाला तक जाने वाले इस ताबूत के जुलूस से शबों का आगाज हो जाता है। यह गिलीम का जुलूस उसी मंज़र को याद दिलाता है जब सर पर तलवार लगने के बाद उन्हें ज़ख़्मी हालत में घर लाया गया था। गम का यह सिलसिला 21 रमजान तक रहता है।

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