- नवेद शिकोह
करीब डेढ़ साल के कोरोना काल में समय-समय पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी दूरदर्शिता साबित की है। इस बार उन्होंने कोरोनों की तबाही में हो रहे पश्चिम बंगाल के चुनाव में अपनी चुनावी रैलियां रद्द करके एक बड़ी लकीर खींच दी है। हो सकता है कि भाजपा के बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह राहुल के इस फैसले को अप्रत्यक्ष नसीहत मान कर खुद भी अपनी चुनावी रैलियां रद्द कर दें।
मालूम हो कि देश भर में तेजी से फैल रहे संक्रमण की दूसरी लहर में मौत की आंधी आई हुई है। इस संकट में बड़े-बड़े नेताओं की चुनावी रैलियों में जबरदस्त भीड़ और कुंभ स्नान की भीड़ आग में घी का काम कर संक्रमण को फैलाने और मौत की आंधी तेज कर सकती है।
इतने कयामत के माहौल में उत्तराखंड सरकार द्वारा कुंभ आयोजन की इजाजत से लेकर केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा चुनाव करवाए जाने को लेकर देश की जनता म़े गुस्सा है। देश में तेज होते कोरोना क़हर के पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की विशाल रैलियों की भीड़ को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
ऐसे में अपनी चुनावी रैलियां रद्द कर राहुल गांधी ने जनता का दिल जीत लिया है। लोग कह रहे हैं कि हो सकता है कि रैलियां न करने से कांगेस को चुनावी नुकसान हो पर राहुल ऐसे फैसले से हारती जिन्दगियों को जीत दिलवा सकते हैं।
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गौरतलब है कि इसी तरह पिछले सवा साल के दौरान राहुल गांधी ने कोविड को लेकर लापरवाह केंद्र सरकार को आगाह करके बड़ी संजीदगी से विपक्षी नेता होने का फर्ज निभाया था।
पिछले वर्ष 2020 की जनवरी में वैश्विक स्तर पर कोविड का अस्तित्व सामने आ चुका था। भारत में भी संक्रमण का केस आने के बाद जब राहुल गांधी ने बयान दिया कि कोरोना की सुनामी आने वाली है, सरकार कुछ करे। ऐसे में सरकारी नुमाइंदों और भाजपा ने राहुल का ख़ूब मजाक उड़ाया। इसके बाद राहुल ने लॉकडाउन के तरीके पर सवाल उठाते हुए इसके सिस्टम का फार्मूला पेश किया। इस बात का भी मजाक बनाया गया। पर देर से ही सही पर सरकार ने आखिरकार लॉकडाउन के सॉफ्ट तरीके पर किसी हद तक अमल करने की कोशिश की।
कोरोना तेजी से फैल चुका था और फिर भारत अमेरिका सहित अन्य देशों में दवाइयां निर्यात कर रहा था। इस कांग्रेस नेता ने इस पर भी एतराज किया, फिर देश की आम राय भी यही बन गई कि यदि भारत दूसरे देशों में दवाइयां भेजता रहा तो अपनी इतनी बड़ी गरीब आबादी के लिए दवाओं की कमी पड़ सकती है और फिर सरकार ने दवाओं खासकर पीसीएम के निर्यात पर रोक लगाई। इसी तरह राहुल गांधी ने चीन को लाभ पंहुचाने वाले व्यपारिक रिश्तों और भारत में फैले चाइना के बाजार पर सवाल उठाकर सरकार को दबाव मे लिया। इसका भी असर दिखाई दिया।
इसके बाद जब कोविड का टीका आया कांग्रेस ने कहा कि दूसरे देशों में टीका भेजने से पहले कोशिश की जाए कि जल्दी से जल्दी देश की आम और.ग़रीब जनता को टीका लगे।
देश में कोरोना का क़हर और मौतों के कोहराम के बीच चुनाव भी हो रहे हैं। इस मेडिकल इमरजेन्सी में जनता की मदद करने, हौसला बढ़ाने, ढांढस देने और आंसू पोंछने के बजाय बड़े-बड़े जन नेता इस वक्त चुनाव जीतने के लिए विशाल रैलियां करके लाखों की भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं। कोरोना से हारती आम देशवासियों की जिन्दगियों को बचाने के बजाय नेतागण चुनाव जीतने की जुगत मे लगे हैं।
चुनावी हवस ने संक्रमण के खतरों को बढ़ा दिया है। कोविड की सेकेंड वेब की सूरत सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल के अलावा तमाम चुनावों में चुनावी रैलियों मे कई दर्जनों रैलियों में करोड़ों लोगों को इकट्ठा किया गया था और अभी भी ऐसी पालिटिकल गैरज़िम्मेदारी जारी है।
राहुल गांधी ने अपनी चुनावी रैलियां रद्द कर देश की लापरवाह राजनीति को बड़ा संदेश दिया है। अब पता नहीं राहुल की अपील पर भाजपा और अन्य दलों पर कितना असर पड़ेगा या फिर सत्ता लोलुप सत्ताधारी कानों में रुई ठूंसकर बिना किसी परवाह अपनी चुनावी रैलियों और रोड शो में चुनाव प्रचार के साथ कोरोना का प्रसार करते रहेंगे।

