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लोकतंत्र है विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल तो उठेंगे ही


लोकतंत्र है विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल तो उठेंगे ही

अमित बिश्‍नोई

दुर्दांत अपराधी का अाखिर शुक्रवार को अंत हो गया. इसी के साथ जेल से विकास दुबे के द्वारा अपना नेक्सेस चलाने की आशंका ने दम तोड़ दिया. साथ ही तारीख पर तारीख का सिलसिला भी खत्म हो गया. लेकिन इन सबमें जो बड़ी चीज रही वो यह है कि कैसे इतने दिनों तक उसका साम्राज्य चलता रहा.उसके पॉलिटिकल कनेक्शन क्या थे.अाखिर वो कौन था जो उसकी मदद कर रहा था. 40 थानों के पुलिसकर्मी और तीन से ज्यादा राज्यों की पुलिस के साथ कैसे वह लुकाछिपी यानी हाईड एंड सीक का खेल खेलता रहा.गिरफ्तारी भी हुई तो ऐसी जगह जहां पर पहले से मीडियाकर्मी मौजूद थे. एक दिन पहले डीएम और पुलिस कप्तान महाकाल मंदिर में क्या करने गए थे.लोकतंत्र है एनकाउंटर पर सवाल तो उठेंगे ही.कैसे एक व्यक्ति जिसे 75 जिलों की पुलिस ढूंढ रही हो, एसटीएफ और आईबी को मात देता रहा. रसूखदार कैसे इसको राज्यों के बॉर्डर तक आसानी से पार कराते रहे. खुफिया तंत्र कैसे फेल रहा.सर्विलांस मुखिबर तंत्र आखिर कैसे ध्वस्त हो गया.

कौन है वो वकील जिनके इशारों पर चलता रहा
दुर्दांत अपराधी को अपने एनकाउंटर का भय था.उसने महाकाल मंदिर में सरेंडर किया. कौन थे वो मास्टरमाइंड वकील जो उसकी मदद कर रहे थे.नाटकीय गिरफ्तारी को देखकर तो यही लग रहा कि उसकी गिरफ्तारी पहले से तय थी.हर जिले में फोर्स बढ़ा दी गई जिसके चलते वह कोर्ट में सरेंडर नहीं कर सका.सूत्रों के मुताबिक, विकास का एक वकील से याराना है अपने केस की बारिकियों के बारे में वह उसी से सलाह लेता था.

क्या रहा घटनाक्रम

प्रश्न जिनके नहीं मिल सके जवाब

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