राहुल पोखरियाल
उत्तराखंड की पहचान जहाँ देवस्थान के रूप में होती है वहीँ इसकी एक पहचान और भी है और वह है राजनीतिक उथल पुथल वाली लेकिन अब लगता है कि इस पहाड़ी राज्य को एक और पहचान मिलने वाली है और वह है पुष्कर सिंह धामी। जी हाँ उत्तराखंड राज्य के वह मुख्यमंत्री जिन्होंने वह कर दिखाया जो आज तक कोई भी मुख्यमंत्री नहीं दिखा सका. धामी के नेतृत्व में भाजपा ने इस राज्य में एक राजनीतिक इतिहास रच दिया, लगातार दोबारा सत्ता में लौटने का इतिहास जो आजतक न ही भाजपा और न ही कांग्रेस, किसी भी पार्टी का मुख्यमंत्री यह कर पाया और उम्मीद है कि पुष्कर धामी आगे चलकर एक और कारनामा भी करेंगे जो अबतक नारायणदत्त तिवारी ही कर पाए हैं.
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हालाँकि अभी इस बात के लिए बहुत समय पड़ा है लेकिन मात्र 6 महीनों में उन्होंने जिस तरह राज्य को संभाला और अपना चुनावी कौशल दिखाया है उसको देखते हुए पुष्कर सिंह धामी के लिए नारायण दत्त तिवारी की बराबरी करना कोई बड़ी बात नहीं। अगर अपवाद के रूप में 2002 की एन डी तिवारी की सरकार को छोड़ दें तो इस राज्य की स्थापना से ही इसके राजनीतिक नेतृत्व में उथल पुथल का इतिहास रहा है. राज्य की पहली अंतरिम सरकार 2000 में भाजपा की बनी, नित्यानंद स्वामी पहले मुख्यमंत्री बने, एक साल बाद ही कमान भगत सिंह कोशियारी को मिली। 2002 में तिवारी जी के नेतृत्व में बनी कांग्रेस सरकार ने पांच साल पूरे किये। 2007 में सत्ता पलटी और भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला, सरकार पूरे पांच साल चली लेकिन नेतृत्व में तीन बार परिवर्तन हुआ. 2012 में फिर सरकार बदली मगर इसबार कांग्रेस को भी विजय बहुगुणा और हरीश रावत के रूप में दो मुख्यमंत्री देने पड़े. 2017 में एकबार फिर भाजपा को मौका मिला मगर मुख्यमंत्रियों के बदलने का सिलसिला जारी रहा. त्रिवेंद्र सिंह रावत को कमान मिली, चार साल तक उन्होंने प्रदेश को संभाला मगर चुनावी वर्ष में स्थितियां बदलीं और तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बन गए मगर भाजपा के लिए स्थितियां और बिगड़ गयीं, उनकी ज़बान फिसलने लगी और पार्टी के लिए ज़मीन, तब एक नया नाम सामने आया पुष्कर सिंह धामी का जो खटीमा से दोबार के विधायक थे, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें प्रदेश को संभालने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी।
धामी ने इस ज़िम्मेदारी को सहर्ष स्वीकार किया, यह उनके राजनीतिक जीवन की बहुत बड़ी परीक्षा थी. चुनाव सिर पर थे, पार्टी के लिए राज्य में स्थितियां बहुत ज़्यादा अनुकूल नहीं थी, समय भी बहुत कम था, ओपिनियन पोल्स भी बदलाव की ओर इशारा कर रहे थे लेकिन पुष्कर धामी ने हर बात, हर अनुमान को ग़लत साबित कर जीत की ऐसी इबारत लिखी जो राज्य की राजनीती में एक इतिहास बन गयी, सत्ता परिवर्तन का सिलसिला थम गया. इस दौरान न तो उनकी ज़बान लड़खड़ाई और न ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्रियों के शुरू किये गए कामों को रोकने का प्रयास किया। पुष्कर धामी की मात्र 6 महीने की मेहनत ने ऐसा रंग दिखाया कि चुनाव हारने के बावजूद शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें ही एकबार फिर प्रदेश का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। यह भी अपने आप में एक इतिहास है कि भाजपा ने किसी को लगातार दूसरी बार प्रदेश के शीर्ष पद के काबिल समझा।
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पुष्कर धामी (Pushkar Dhami) को दूसरी बार राज्य की गद्दी मिल गयी है, अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत भी उन्होंने शानदार तरीके से की है. अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने पहला बड़ा एलान राज्य में कॉमन सिविल लागू करवाने का किया, इसके लिए उन्होंने कमेटी का गठन भी कर दिया है. राज्य के विकास के लिए केंद्र और राज्य की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए प्रयास युद्ध स्तर पर शुरू हो चुके हैं, 6 महीने के शासनकाल में उनके काम और कार्यशैली को देखते हुए राज्य की जनता को उनसे बहुत आशाएं हैं, आशाएं पीएम मोदी और गृहमंत्री अमितशाह को भी हैं, 2024 में राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा को कामयाबी दिलाने और मोदी-3 की उम्मीदों को और मज़बूत करने के लिए. पुष्कर सिंह धामी ने अपने अल्पकाल में नेतृत्व और कार्यशैली की जो बानगी पेश की है उसे देखते हुए तो यही लगता है कि वह कार्यकाल पूरा करने वाले भाजपा के पहले मुख्यमंत्री ज़रूर बनेंगे।
