- जिले में 2008 महिलाओं ने संस्थागत प्रसव कराया, 354 ने पीपीआईयूसीडी को अपनाया
परिवार नियोजन या बच्चों में अंतर को लेकर लगाई जाने वाली पीपीआइयूसीडी लगवाने के मामले में मेरठ भी अपना स्थान बनाने में कामयाब रहा है.अपर मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डा. पूजा शर्मा ने कहा कि हेल्थ डिपार्टमेंट की कोशिश होती है कि संस्थागत प्रसव के मुकाबले कम से कम 20 परसेंट महिलाओं को जागरूक कर पीपी आईयूसीडी के लिए तैयार किया जाए . उनको परिवार कल्याण के बारे में जागरूक करने में आशा कार्यकर्ता और एएनएम की प्रमुख भूमिका रहती है. फाइनेंशियल ईयर 2020-21 की शुरुआत ही कोरोना के चलते लॉक डाउन से हुई, फिर भी प्रदेश के कुछ जिलों की महिलाओं ने संस्थागत प्रसव के तुरंत बाद इस विधि को अपनाने में खास दिलचस्पी दिखाई.
मेरठ में 354 ने पीपीआईयूसीडी को अपनाया
उन्होंने बताया हेल्थ मैनेजमेंट इन्फार्मेशन सिस्टम (एचएमआईएस) के 12 जून तक के आंकड़ों के मुताबिक मेरठ जिले में गत अप्रैल से 12 जून तक यानि करीब ढाई माह में 2008 महिलाओं ने संस्थागत प्रसव (सरकारी व निजी अस्पताल मिलाकर) कराया, जिसमें से 354 ने पीपीआईयूसीडी को अपनाया. करीब 17.63 प्रतिशत महिलाओं ने इसे अपनाया है.
बुलंदशहर की महिलाएं आगे
मेरठ जोन में बुलंदशहर की महिलाएं आगे हैं. यहां की 571 महिलाओें ने पीपीआइयूसीडी लगवाई है. गौतमबुद्ध नगर की 124, हापुड़ की 352, मेरठ की 354 और बागपत की 80 महिलाओं ने पीपीआइयूसीडी प्रसव के बाद लगवाई है.
दो बच्चों के जन्म में 3 साल का अंतर
मातृ एवं शिशु के बेहतर स्वास्थ्य के लिहाज से दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम तीन साल का अंतर अवश्य रखना चाहिए. उससे पहले दूसरे गर्भ को धारण करने योग्य महिला का शरीर नहीं बन पाता और पहले बच्चे के उचित पोषण और स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह बहुत जरूरी होता है. इसके लिए लोगों को जागरूक करने के साथ ही उन तक उचित गर्भ निरोधक सामग्री पहुंचाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को भी दक्ष करने का प्रयास किया जाता है. उनका कहना है कि परिवार नियोजन में स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर प्रदेश के सभी जिलों में उत्तर प्रदेश तकनीकी सहयोग इकाई (यूपी टीएसयू) मदद कर रही है, जिसका प्रयास सराहनीय है.
क्या है पीपीआईयूसीडी?
पोस्टपार्टम इंट्रा यूटाराइन कांट्रासेप्टिव डिवाइस(पीपीआइयूसीडी) गर्भ निरोधक विधि का नाम है जिसके जरिये बच्चों में सुरक्षित अंतर रखने में मदद मिलती है. प्रसव के तुरंत बाद अपनाई जाने वाली यह विधि सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क उपलब्ध है. प्रसव के बाद अस्पताल से छ़ुट्टी मिलने से पहले ही यह डिवाइस लगवाई जा सकती है. इसके अलावा माहवारी या गर्भपात के बाद भी डाक्टर की सलाह से इसे लगवाया जा सकता है. एक बार लगवाने के बाद इसका असर पांच से दस वर्षों तक रहता है. यह बच्चों में अंतर रखने की लंबी अवधि की एक विधि है.
छोटा सा उपकरण लगाते हैं
गर्भाशय में एक छोटा उपकरण लगाया जाता है। यह दो प्रकार के होते हैं. कॉपर आइयूसीडी 380ए इसका असर दस वर्षों तक रहता है. दूसरी कॉपर आइयूसीडी 375 इसका असर पांच वर्षों तक रहता है. ध्यान रहे केवल प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा ही एक छोटी सी जांच के बाद इसे लगवाया जा सकता है. जब भी दंपत्ति बच्चा चाहे अस्पताल जाकर इसे निकलवा सकते हैं.

