अमित बिश्नोई
छोटा परिवार, सुखी परिवार। बहुत पुराना नारा है, जब यह नारा दिया गया था तब किसी ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया, शायद इसमें कोई राजनीति नहीं थी या यह भी कह सकते हैं कि उस समय के राजनीतिज्ञ ऐसे नहीं थे जिन्हें हर बात में राजनीति दिखाई देती हो. मगर चूँकि अब हर काम राजनीति को सामने रखकर ही किया जाने लगा है तो सवाल भी हर काम पर होने लगे हैं। ऐसा ही कुछ यूपी में नई जनसँख्या नीति के एलान के बाद हो रहा है। चूँकि राज्य में चुनाव काफी नज़दीक हैं इसलिए इस फैसले पर राजनीति होना लाज़मी है. पालिसी अच्छी है या बुरी, सोच समझकर बनाई गयी है या नहीं, चुनावी फायदे के लिए किसी ख़ास तबके के लिए यह क़दम उठाया गया है, इस पर आगे बात करेंगे मगर उससे पहले इस नई जनसँख्या नीति के बारे में संक्षेप में जान लेते हैं।
क्या है नई नीति में
इस नई जनसख्याँ नीति में दो बच्चों तक परिवार को सीमित रखने पर ज़ोर दिया गया है. इस नई नीति के मसौदे के अनुसार जिन लोगों के दो से ज्यादा बच्चे होंगे उन्हे लगभग 77 सरकारी सुविधाओं से वंचित होना पड़ सकता है। नियम तोड़ने पर आपकी नौकरी भी जा सकती है, आप सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य घोषित हो सकते हैं, आपको स्थानीय निकाय चुनावों से लड़ने से रोका जा सकता है, आपका प्रोमोशन भी रुक सकता है. इसके अलावा वन चाइल्ड पालिसी अपनाने वाले को प्रोत्साहित करने की बात है, ऐसा करने वाले को सरकारी तौर अलग से कई सुविधाएं या सुविधाओं में बढ़ोत्तरी करने की बात कही गयी है.
एक साथ चार बच्चों के जन्म से उठता सवाल
अब एक दिलचस्प घटना से बात आगे बढ़ाते हैं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस दिन प्रदेश में नयी जनसँख्या पालिसी का एलान किया उसके अगले ही दिन गाज़ियाबाद में एक महिला ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया जिसने इस नयी पालिसी पर एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया, आप कहेंगे यह कृत्रिम गर्भधान (ivf) द्वारा हुआ मगर एक परिवार में चार बच्चों का जन्म तो हुआ ही. अब इस दंपत्ति का क्या होगा, क्या इससे सरकारी सुविधाएँ छीन ली जाएँगी, क्योंकि संतानहीन इस दंपती ने तो कृत्रिम गर्भाधान का सहारा इसीलिए लिया होगा कि बेऔलाद होने के दंश से बच सकें, इस दंपत्ति ने चार बच्चों की चाहत तो नहीं की होगी। प्राकृतिक रूप से एक साथ कई बच्चे होने की घटनाएं अक्सर सुनने को मिलती हैं, भले ही ऐसे मामले कम होते हैं लेकिन होते तो हैं। जुड़वां बच्चे होने की बात तो एक तरह से आम है, आपको अपने आस पास जुड़वां बच्चे आसानी से मिल जायेंगे।
सामाजिक परंपरा
दूसरे देशों की बात तो हम नहीं कर सकते लेकिन भारत में यह बात अकाट्य सत्य है कि हर परिवार को वंश बढ़ाने वाला यानी लड़का चाहिए। जिस फैमिली के पहले दो बच्चे लड़कियां हैं वह लड़के की चाहत में प्रयास ज़रूर करेगा, इनको आप सरकारी सुविधाएँ रोककर कंट्रोल नहीं कर सकते और न ही भारत जैसे देश में यह धारणा कभी बदलने वाली है क्योंकि हमारे समाज का ताना बाना ही ऐसा है. वंश को आगे बढ़ाने की परम्परा में पुरुषों से कहीं आगे महिलाएं हैं, वह बेटा न पैदा कर पाने वाली महिला बनने का ताना कभी नहीं बर्दाश्त कर पाएंगी। खानदान का वारिस पाने के लिए वह सारी सुविधाओं का त्याग कर सकती हैं। इसलिए कम से कम सरकारी सुविधाओं का डर दिखाकर इनको बदला नहीं जा सकता, हां इनकी सोच को बदलकर इस बारे में ज़रूर कुछ किया जा सकता है।
एक बच्चा नीति
नई जनसँख्या नीति में एक बच्चे की नीति की भी बात कही गयी है। कहा गया है कि एक बच्चे के बाद जो दंपत्ति नसबंदी का विकल्प अपनाएगी उसे अतिरिक्त सरकारी सुविधाएँ दी जाएँगी। इस मामले में भाजपा और योगी सरकार के करीबी संगठन विश्व हिन्दू परिषद् ने सवाल उठा दिए हैं. विहिप ने इसे समाज में असंतुलन बढ़ाने वाला क़दम बताया है।विहिप की बात में दम भी है, मान लीजिये अगर कोई एक तबका सुविधाओं के लालच में एक बच्चा नीति को अपनाता है और दूसरा वर्ग दो बच्चों वाली नीति अपनाकर सरकारी सुविधाओं को बरकरार रखता है तो दोनों वर्गों में आबादी का असंतुलन आना लाज़मी है. और यह सामाजिक असंतुलन पूरे सामाजिक संतुलन को छिन्न भिन्न कर सकता है. सरकार ने अगर इस नियम को लागू किया तो भविष्य में इसके काफी खतरनाक परिणाम हो सकते हैं.
राजनीति
वैसे तो देश अब चौबीसों घंटे चुनावी मोड में रहता है मगर बात जब यूपी जैसे राज्य के चुनाव की हो तो इतने बड़े मुद्दे पर राजनीति न हो, ऐसा कैसे हो सकता है. योगी सरकार की जनसँख्या नीति का भले ही राजनीतिक पार्टियों ने सीधे तौर पर विरोध नहीं किया है मगर इसकी टाइमिंग को लेकर योगी सरकार को ज़रूर घेरने की कोशिश हो रही है. विपक्ष इसे पूरी तरह चुनावी हथकण्डा बता रहा है तो वहीँ सरकार इसे नवजात मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करने की कोशिश, किशोरों के बेहतर पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य की कोशिश, नपुंसकता और बांझपन की समस्या का समाधान और जनसंख्या स्थिरीकरण का प्रयास बता रही है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ छुटभय्ये मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं के अलावा अभी तक किसी बड़े प्लेटफार्म से जनसँख्या नीति का विरोध नहीं किया गया है.
अँधेरा में छोड़ा तीर
बहरहाल योगी आदित्यनाथ ने जनसँख्या नीति का एक ऐसा तीर छोड़ा है जो फिलहाल निशाने की तलाश में भटक रहा है. अब देखना यह है कि ध्रूवीकरण का यह चुनावी तीर लक्ष्य को तलाश कर उसे भेद पाता है या नहीं, या फिर यूं ही अँधेरे में भटकता फिरेगा। असम के बाद यूपी में जनसँख्या को मुद्दा बनाना यह साबित करता है कि यह आगे भी जारी रहेगा और हैरानी न होगी कि इस मुद्दे पर संसद में बहस हो रही हो, क्योंकि ऐसी बातें सामने आ रही हैं कि एक प्राइवेट बिल राज्यसभा में आने वाला है जिसमें एक बच्चा नीति को प्रोत्साहित करने की बात कही गयी है. मतलब यह कि हम चीन जैसा बनने की कोशिश में लगे हैं यह अलग बात है कि चीन अब आबादी बढ़ाने में लगा हुआ है.

