एक तरफ यूपी में आजमगढ़ और रामपुर की लोकसभा सीटों के उपचुनावों के लिए उम्मीदवारों का एलान हो रहा है वहीँ देश की सबसे पुराणी पार्टी कांग्रेस ने इन चुनवों में अपने हाथ खड़े कर लिए हैं. खबर आ रही है कि इन उपचुनावों में कांग्रेस पार्टी अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी। इस फैसले के पीछे कांग्रेस पार्टी की ओर से कहा जा रहा है कि पहले संगठन को सुधारा जायेगा उसके बाद ही किसी चुनाव में जाया जायेगा।
कांग्रेस पार्टी के इस फैसले पर अब सवाल उठ रहा है कि उम्मीदवारों की गैर मौजूदगी से आजमगढ़ और रामपुर के उन कांग्रेसियों का क्या होगा जो उसे वोट देते आये हैं. रामपुर में तो कांग्रेस वोटरों की काफी अच्छी संख्या भी है, वह सब किस पार्टी की तरफ जायँगे। उन्हें किसी न किसी को तो वोट करना ही है, सपा में जांय या भाजपा में जांय। भूलना नहीं चाहिए कि एकबार वोटर खिसका तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वह आपके पास वापस आएगा।
विधानसभा हो या लोकसभा, गठबंधन की सियासत करके कांग्रेस पार्टी ने अपना बड़ा नुक्सान किया है क्योंकि हर गठबंधन में वह जूनियर पार्टनर ही रही है , नतीजे में कम सीटें, कम उम्मीदवार, लोगों तक कम पहुँचाना और वोट बैंक का खिसकना। इन उपचुनावों में उम्मीदवार न उतारना भी उसी राह पर चलना है। एक तरफ तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं से लड़ने की बात करती है और दूसरी तरफ पीठ दिखाती है. उसकी इन्हीं ढुलमुल नीतियों ने पार्टी का बेडा गर्क कर रखा है.
इससे अच्छी तो बसपा है, भले ही विधानसभा चुनावों में उसका सूपड़ा पूरी तरह साफ़ हो गया लेकिन उसे आजमगढ़ से उम्मीदवार तो उतारा ही है, कांग्रेस पार्टी के तो दो उम्मीदवार जीतकर आये हैं उसका सूपड़ा नहीं साफ हुआ है ऐसे में उम्मीवार न उतारने की बात गले के नीचे नहीं उतरती है.

