श्राद्ध एकान्त में और गुप्तरुप से करना चाहिये। पिण्डदान पर दुष्ट मनुष्यों की दृष्टि पड जाने पर वह पितरों तक नहीं पहुचँता है। किसी दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिये। पर्वत, जंगल, पुण्यतीर्थ और देवमंदिर ये दूसरे भूमि में नही आते। इन पर किसी का स्वामित्व नहीं है। श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा होती है, श्राद्ध के मौके पर ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है। जो बिना ब्राह्मण के श्राद्ध करता है, उसके घर पितर भोजन नहीं करते। ब्राह्मणहीन श्राद्ध करने से मनुष्य महापापी होता है। श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, आयु, धन, आरोग्य, सुख, मोक्ष आदि प्रदान करते हैं। श्राद्ध के योग्य समय हो या न हो, तीर्थ में पहुंचते ही मनुष्य को स्नान, तर्पण और श्राद्ध करना चाहिये।
शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष और पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्ण श्राद्ध के लिये श्रेष्ठ माना गया है। सायंकाल में श्राद्ध नहीं करना चाहिये। सायंकाल का समय राक्षसी बेला से प्रसिद्ध है। चतुर्दशी को श्राद्ध करने से कुप्रजा पैदा होती है। परन्तु जिसके पितर युद्ध में मारे गये हो, वे चतुर्दशी को श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं। जो चतुर्दशी को श्राद्ध करने वाला स्वयं युद्ध का भागी होता है। रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये। ऐसा करने से उसे राक्षसी कहा गया है। दोनो संध्याओं में श्राद्ध नहीं करना चाहिये। दिन के आठवें भाग में जब सूर्य का ताप घटने लगता है उस समय का नाम कुतप है। उसमें पितरों के लिये दिया दान अक्षय होता है। कुतप, कम्बल,खड्गपात्र, कुश, चाँदी , गा,ै तिल और दौहित्र ये आठांे कुतप से प्रसिद्ध है। श्राद्ध में तीन वस्तुएँ पवित्र हैं, दौहित्र, कुतपकाल, तथा तिल। श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, बाहर और भीतर की शुद्धि, क्रोध नहीं करना। जल्दबाजी न करना।
