- नवेद शिकोह
पंचायती चुनाव की सूरत बिल्कुल ही बदल गई है। एक जमाना था जब ये चुनाव प्रत्याशी की स्थानीय सेवाओं और पहचान पर होते थे। पार्टी का सिम्बल या पार्टी समर्थित जैसे अल्फाज़ ही बस इस चुनाव में एंट्री ले पाते थे। लेकिन अब राजनीति दलों ने अपनी जड़ों को भारीभरकम ग्रामीण आबादी से जोड़ने के लिए पंचायती चुनावों को अपने कब्जे मे ले लिया है। और इस तरह क्षेत्रीय दल ही नहीं राष्ट्रीय दल भी ऐसे चुनावों को अपनी राजनीतिक नीतियों से जकड़े ले रहे हैं।
बदलाव का सिलसिला 2014 से पहले शुरू हो चुका था जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भाजपा के जनाधार का दायरा बढ़ाने के लिए यूपी के ग्रीमीण परिवेश में अपनी दस्तक देना शुरु की थी। हिंदुत्व, हिन्दुओं की रक्षा-सुरक्षा के साथ राष्ट्रवाद के उत्थान के नाम पर गांवों के चौपालों और खाप पंचायतों में संघ की शाखाओं ने एंट्री ली। इस तरह से गरीब, किसान, मजदूर और पिछड़े तबक़ों को अपनी विचारधारा से जोड़ने और विश्वास में लेकर लोगों में भाजपा के प्रति भरोसा पैदा करना शुरु किया जिसके नतीजे में धीरे-धीरे पंचायत चुनावों में भाजपा को सफलता मिलना शुरू हुई। जाहिर सी बात है कि जब यूपी के सत्तर प्रतिशत भूभाग ग्रामीण परिवेश मे भाजपा ने अपना दबदबा बना लिया तो विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी सफलताओं के द्वार खुलने के रास्ते खुल ही जाने थे।
सिर्फ शहरी मतदाताओं पर ही निर्भर ना रहकर गांव-देहातों में कमल खिलाने के इस फार्मूले को भाजपा जारी रखे है। जिसके देखा-देखी यूपी के इस बार के पंचायत चुनावों को सपा-बसपा, कांग्रेस यहां तक की आम आदमी पार्टी ने भी बेहद गंभीरता से लिया है। यूपी में अपना राजनीतिक वजूद क़ायम करने की कोशिश में आप पहली बार पंचायत चुनाव में अपने प्रत्याशी उतार रही है। बसपा सुप्रीमों ने भी कैडर से साफ कह दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए टिकट देने से पहले पंचायत चुनाव की परफार्मेंस पर ग़ौर किया जाएगा।
इसी तरह कांगेस भी मजबूती के साथ पंचायत चुनाव लड़ रही है और इसको विधानसभा चुनाव की तैयारी मान रही है।
समाजवादी पार्टी ने इस चुनाव जरिए अति पिछड़ी और अनुसूचित जातियों को साधने की कोशिश की है। पिछड़ी जाति की आरक्षित सीट पर गैर यादव और गैर जाटव उम्मीदवार उतारकर हाथ से निकले जनाधार को वापस लाने की कोशिश की जाएगी।
इसी क्रम में भाजपा ही काफी गंभीरता से चुनावी तैयारी में लगी है। यूपी के पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में किसानों को अपने विश्वास मे लेने के लिए भाजपा के दिग्गजों को जमीनी संघर्ष के लिए लगाया गया है। पूर्वी और पश्चिमी यूपी भाजपा के लिए इसलिए भी चुनौती है क्योंकि पश्चिम में कृषि कानूनों को लेकर किसानों में खासी नाराजगी है जबकि पूर्वी में अनुप्रिया पटेल और ओमप्रकाश राजभर अपने-अपने दलों के उम्मीदवारों के लिए पिछड़ों को अपने पाले में लेने का प्रयास कर रहे हैं। ओमप्रकाश पहले भाजपा के साथ थे और अनुप्रिया आज भी भाजपा के साथ हैं किंतु उनका दल अकेले पंचायत चुनाव लड़ेगा।
कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के पंचायती चुनाव आगामी विधानसभा चुनावी परेड की फुल ड्रेस रिहर्सल जैसे लग रहे हैं। हर दल इस छोटे चुनाव की प्रयोगशाला में अपने चुनावी फार्मूले को टेस्ट करेगा। सत्तारूढ़ भाजपा से लेकर सपा, कांग्रेस और आप सभी दलों ने इस चुनाव के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों यानी यूपी की आत्मा से जुड़ने की चुनावी रणनीति तैयार कर ली है। लेकिन इन कोशिशों में कौन कितना सफल होता है ये तो वक्त बताएगा।

