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पंचायत चुनाव: प्रशासन के पास धारा 144 की लाठी, विपक्ष को पक्षपात की आशंका!


पंचायत चुनाव: प्रशासन के पास धारा 144 की लाठी, विपक्ष को पक्षपात की आशंका!


कोविड के खतरों के मद्देनज़र पंचायत चुनाव एक सख्त गाइड लाइन के दायरे में होगा। रैलियों-सभाओं की भीड़भाड़, शोर शराबा,गाजा-बाजा, दल-बल.. सब ख़त्म। सामाजिक दूरी युक्त- भीड़ मुक्त पंचायत चुनाव आम जनता को राहत देगा। लेकिन ज्यादातर प्रत्याशियों को ये अच्छा नहीं लग रहा। ख़ासकर विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को ये शंका होने लगी है कि सारे नियम-कानून प्रशासन सत्ता के दबाव में उनपर ही लाद देगा जबकि सत्ता पक्ष के प्रत्याशियों की गतिविधियों के प्रति प्रशासन आंखे मूंदे रहेगा। सरकार विरोधियों को लग रहा है कि कोविड प्रोटोकॉल और धारा 144 के बहाने सरकार ने ये चुनाव पूरी तरह अपने कब्जे मे ले लिया है। तर्क दिए जा रहे हैं कि कोविड के खतरों का अहसास होता तो इस महामारी के बीच पंचायत चुनाव होते ही नहीं। थोड़े दिनों के लिए चुनाव आगे बढ़ा दिए जाते। पहले गांव-गाव में कोरोना के वैक्सीनेशन का अभियान चलता। कोरोना संक्रमण थम जाता तब चुनाव की तिथियां घोषित होना चाहिए थी।

चुनाव सिर्फ किसी पद पर काबिज होने की लड़ाई नहीं होती। जनता और उम्मीदारों के समागम का नाम होता है चुनाव। मुद्दों, उपलब्धियों , वादाखिलाफी, वादों, कामों को चुनाव बेला में जनता के समक्ष पेश किया जाता है। अपने विचारों, अपने इरादों और वादों के साथ प्रत्याशी जनता तक पंहुचता है। जनसभाओं और रैलियों का उद्देश्य भी यही है कि जनता के समक्ष उम्मीदवार अपने मुद्दे रखे।

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इसलिए ही चुनावी रैलियां, जनसभाएं और प्रचार लोकतंत्र के उत्सव की आत्मा कहा जाता था। कोरोना के बढ़ते प्रकोप में जब भीड़ पैदा करने वाली चुनावी गतिविधियों इन दिनों संभव नहीं थी तो चुनाव को आगे बढ़ा देना चाहिए था। चुनाव से जनसभाओं जैसी रौनकों को अलग करना ऐसा लग रहा है जैसे मछली को पानी से अलग किया जाए।

कुछ चुनावी रौनकें छिन जाने से प्रत्याशियों को ऐसा लग रहा है जैसे वो गाजे -बाजे, भीड़-भड़क्का, जोर-शोर के साथ बारात ले जाने की हसरत और तैयारियों में हों पर अंत में चार लोगों के साथ ही वो दूल्हा बनकर बारात ले जाने पर मजबूर हो गये हों।

दल-बल और बाहुबल वाले ज्यादा उदास हैं। हांलाकि चुनावी रौनकें छिनने का जिम्मेदार कोरोना को माना जा रहा है।

चुनावी रौनकों का हिस्सा बनने वाले गांव के कुछ युवक कोरोना को खूब गालियां दे रहे हैं। बताते हैं कि वे चुनावी उत्सव को मस्ती का सीजन भी मानते हैं और अस्थाई रोजगार की सहालग भी। नाम ना छापने की शर्त पर ऐसे कुछ युवक बताते हैं कि चुनावी काम में उन्हें दो पैसे मिल जाते हैं।

तमाम विचारों और प्रतिक्रियाओं का निष्कर्ष ये निकल रहा है कि बेहतर ये होता कि कोरोना के बढ़ते प्रकोप में पंचायत चुनाव होना ही नहीं चाहिए था। अजीब बात ये है कि जब यूपी में कोरोना संक्रमण तेज़ी से बढ़ने लगा था और संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही थी तब पंचायत चुनाव की घोषणा की गई।

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