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पलटुराम फिर गुलाटी मारने वाले हैं

nitish kumar

अमित बिश्नोई
चुनाव होने वाले हों और बिहार की राजनीती में उठपटक न हो ऐसा तो हो नहीं सकता। उठपटक अभी हुई नहीं है लेकिन उसकी पटकथा लिखी जा चुकी है बस मंच पर उसका मंचन होना बाकी है। हमेशा की तरह इस पटकथा के हीरो भी नितीश कुमार ही हैं. आप इन्हें कुछ भी कहें। पलटू राम या कुछ भी लेकिन इससे नितीश कुमार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। राजद और भाजपा से उनका दो बार तलाक हो चूका है, अब एक बार फिर नितीश कुमार के भाजपा से निकाह करने की बातें सियासी गलियारों में तेज़ी से गश्त कर रही हैं. निकाह की तैयारी लगभग हो चुकी है, कितने बाराती आएंगे, उसमें कितने VVIP होंगे, कितने VIP होंगे, निकाह कौन पढ़ायेगा, ये सब तय हो रहा है लेकिन इसबार अभी ये भी साफ़ नहीं हुआ है कि दूल्हा कौन बनेगा? हां राजद से फिर तलाक होने वाला है ये बात लगभग पक्की है.

नितीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हैं जैसे बातें कहने वाले सुशील मोदी के सुर बदले हुए हैं, सुशील मोदी कह रहे हैं कि वापसी की गुंजाईश कभी ख़त्म नहीं होती। उनकी बात सही है, राजनीति चीज़ ही ऐसी है कि न तो कोई परमानेंट दोस्त होता है और न दुश्मन। मौके और हालात के हिसाब से दोस्त और दुश्मन तय होते हैं. राजनीति की गरिमा क्या होती है, नैतिकता क्या होती इसका अब कोई अर्थ नहीं रह गया है. और फिर नेता जब नितीश कुमार जैसा हो तो फिर क्या कहने। हर चुनाव में नया दोस्त बनाना, नए घर की तलाश करना, नई बैसाखी ढूंढ़ना तो नितीश की आदतों में शामिल है और आदत कभी नहीं छूटती।

लेकिन क्या इस बार नितीश के लिए पलटी मारना आसान है और पलटी मारकर अपने वजूद को बचाना आसान है. भाजपा अगर नितीश के साथ इसबार हाथ मिलाती है तो इतना निश्चित है कि इस बार वो नितीश को पूरी तरह ख़त्म कर देगी। पीएम मोदी और अमित शाह की जिस तरह की सियासत है वो सियासत बार बार ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त करने वाली नहीं है. यकीनन प्रधानमंत्री मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के लिए यूपी के साथ ही बिहार में अपने प्रदर्शन को दोहराना होगा। भाजपा खून के घूँट पीकर नितीश के साथ हाथ मिला सकती है लेकिन नितीश के लिए भाजपा से हाथ मिलाना एक आत्मघाती कदम होगा। पीएम मोदी और अमित शाह आने वाले सालों में उन्हें इस लायक नहीं रखेंगे कि वो पाला बदल बदलकर मुख्यमंत्री बनते रहें। बहुत बार नितीश ने खूँटी पर दुपट्टा टांगा, इस बार खूंटी पर दुपट्टा नहीं टोपी ही टंगेगी।

दरअसल नितीश इस बार पलटना नहीं चाहते थे और इसीलिए उन्होंने पीएम मोदी के खिलाफ एक साझा विपक्ष की पहल की शुरुआत की थी. विपक्षी गठबंधन के वो सर्वे सर्वा थे. लगातार विपक्षी पार्टियों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे और जब उनसे पीएम पद के लिए सवाल पूछा जाता तो एक ही जवाब होता कि वो सारी विपक्षी पार्टियों को एकसाथ देखना चाहते हैं, इसके अलावा उनकी राष्ट्रीय राजनीती में कोई इच्छा नहीं है लेकिन नितीश के अलावा हर कोई जनता था कि उनके दिल में क्या है, आठ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नितीश कुमार एकबार प्रधानमंत्री पद की शपथ भी लेना चाहते हैं. यही वजह थी कि वो जी जान से जुटे हुए थे लेकिन जिस दिन से आधिकारिक रूप से इंडिया गठबंधन का एलान हुआ, नितीश को अपने सपनो पर पानी फिरता हुआ नज़र आया, वो लगातार इंडिया अलायन्स से दूरी बनाने लगे. यहाँ तक कि संयोजक का पद लेने से भी साफ़ इंकार कर दिया। नितीश को एहसास हो गया कि यहाँ पर पीएम पद की वैकंसी खाली नहीं है इसलिए बेहतर यही है कि 9वीं बार की तैयारी करो.

भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत के साथ ही नितीश ने भी 9वीं बार की तैयारी शुरू कर दी. अयोध्या का शोर थमा और कर्पूरी ठाकुर का देश भर में शोर उठा. भारत रत्न का एलान हो गया और साथ ही इस बात का भी एलान हो गया कि दुश्मन फिर दोस्त बनने वाले हैं. बात बदल गयी, बोल बदल गए भाषा बदल गयी. तेस्जवी यादव की कुर्सी पर लगी उनके नाम की पर्ची नोचकर फेंकी जाने लगी और उस कुर्सी पर नितीश का कोई और करीबी बैठने लगा. राजनीति में सकेतों की भाषा की बहुत अहमियत होती है, इस भाषा का पिछले दो दिनों से खूब इस्तेमाल हो रहा है. राजद ये सब देख रही है, उसे कोई हैरत नहीं, लालू को कोई हैरानी नहीं। हालात से निपटने की तैयारी तो उनकी भी होगी, क्या होगी अभी पता नहीं। फिलहाल बिहार से यही खबर है कि पल्टूराम एकबार फिर गुलाटी मारने को बिलकुल तैयार बैठे हैं.

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