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‘होरी’ के नाम खुला पत्र मेरे प्रिय भाई ‘होरी’!


‘होरी’ के नाम खुला पत्र मेरे प्रिय भाई ‘होरी’!

अनूप मणि त्रिपाठी

अबे काहे के प्रिय! शिष्टाचार गया तेल लेने। इस वक्त तू अन्नदाता है मतदाता नहीं। अब तू तेल देख, तेल की धार देख!

तू उदंड काहे होता जा रहा है बे! तुझ पर निबन्ध लिखे जाते हैं, तो क्या तू अनुबन्ध नहीं करेगा! सरकार जब-जब तेरे भले की सोचती है, तो तू खेत छोड़ सड़कों पर धान बोने लगता है। जमीन का अधिग्रहण करने जाती है, तब-तब तू बवाल काटता है। फिर शिकायत करता है कि पुलिस-प्रशासन ने तुझे पीटा। उद्दंड को दंड नहीं तो क्या पेड़ा मिलेगा! आसानी से जमीन क्यों नहीं छोड़ देता? जमीन में तेरी नार गड़ी है क्या? जमाना चांद से मिट्टी खोद ला रहा है, एक तू है कि आज भी जमीन को अपनी मां कहता है। इमोशनल फ़ूल! जमीन के एक छोटे से टुकड़े के लिए अपनी मिट्टी पलीद कराने पर क्यों तुला है मेरे भाई!

मुआवजा! लागत! न्यूनतम समर्थन मूल्य! की रट लगा कर मरा जा रहा है। तूने जो सरकार का समर्थन किया था,उसी का मूल्य तुझे मिल रहा है। तू कोई विधायक है क्या, जो तुझे मुँह माँगी कीमत दी जाए! फसलें रिजॉर्ट में नहीं रखी जाती हैं बाबू! क्या समझे!वैसे भी तेरा गुजारा कैसे चल रहा है, पूरी दुनिया जानती है। अगर खेती-किसानी से ही तेरा गुजारा चल जाता, तो आत्महत्या का रिकार्ड कायम नहीं करते तेरे भाई लोग। ओ मेरे भोले भंडारी ! अगर फसल का दाम अधिक मिल भी गया, तो महंगाई छीन ले जाएगी! जब हर हाल में खोना है, तो फिर किस बात का रोना है!

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मैं पूछता हूं कि उचित-अनुचित,नैतिक-अनैतिक का फैसला करने वाला तू कौन होता है? तू भूल रहा है तूने इन सब कामों के लिए चुनाव में अपना नुमाइंदा छाँटा है। और वही छटा हुआ तेरा नुमाइंदा विधानसभा-संसद में तेरे लिए चिंतामग्न है। अपने को तू बड़ा काबिल न समझ! यह नीतिगत मामला है और तू उसमें अपनी सूखी टांग न अड़ा। अरे, तुझे तो गांव का महाजन ही सारी उम्र सूद की चक्की में पीसता रहता है। उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं पाता और चला है सरकार से पंगा लेने। अरे, तेरी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए तो लेखपाल-कानूनगो ही काफी है, मेरे लाल!

तू बड़ा खुदगर्ज है! तेरी सोच भी संकीर्ण है। अपनी सोच में तनिक लोच ला,समझ! देश के बारे में सोच। समाज के बारे में सोच। तू बाजार से जुड़ेगा। तुझे सड़कों पर भले ही जाम मिले, पर बाजार तुझे खुला ही मिलेगा। सोच,तेरे जमीन छोड़ने से वहां चौड़ी-चौड़ी, चिकनी-चिकनी,आए हाय! सड़क बनेंगी। मॉल बनेगा। बिल्डिंग बनेंगी। सोच, तू राजपथ पर चलेगा। मॉल में घूमेगा। बिल्डिंग की छाँव में सुसताएगा। पेड़ की छाँव भी कोई छाँव होती है लल्लू! बुरा मत मानना तेरे बाप-दादाओं ने खेती कर के क्या उखाड़ लिया, जो तू उखाड़ लेगा। मेरी मान, जमीन के मोह का त्याग कर, ऐत-बेत जो मुआवजा मिले अपनी अंटी में धर और नये भारत निर्माण के लिए सुस्वागतम का वंदनवार तैयार कर।

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सच-सच बता…तू ही बता… इस देश में किसान की जरूरत क्या है? यह सही है कि खेती किसान करता है, मगर क्या सिर्फ इतनी सी बात पर वह महत्वपूर्ण हो जाता है? अगर वह खेती नहीं करेंगा, तो मगरमच्छनुमा बड़ी-बड़ी कंपनियां करेंगीं। कर ही रही हैं। तू शायद इस मुगालते में है कि कृषि प्रधान देश को तेरी बहुत जरूरत है। बेशक भारत एक कृषि प्रधान देश है। मगर सुन ले तू उससे ज्यादा नौंटकीप्रधान देश है। यहां का इतिहास क्या कहता है, यह भी तो जानो मेरे मिट्टी के माधव? यहां मजे में प्रधान रहता है या तो किसान नेता। किसान तो आयोगों में रहता है। रपटों में रहता है। योजनाओं में रहता है। भाषणों में रहता है। कर्ज में रहता हैं। अगर तू मजे में दिखना चाहता है, तो सरकारी विज्ञापन या ट्रैक्टर के विज्ञापन में दिख। खेत में तू बेजार ही दिखेगा,अभागे।

तुझ पर किसी कवि ने कविता ‘ हे ग्राम देवता नमस्कार’ क्या लिख दी , तू अपने को देवता समझ बैठा! तेरी शान में किसी शायर ने ‘जिस खेत से दहका को मयस्सर न हो रोटी,उस खेत के हर खोश-ए-गंदुम को जला दो’ शेर दे मारा, तो तू हवा में उड़ने लगा है! बहुत पहले किसी बूढ़-पुरनिया ने ‘ उत्तम खेती मध्यम बान’ की कहावत चला दी, तो तू कल्पनालोक में भ्रमण करने लगा ! किसी गीतकार ने ‘मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरा मोती’ क्या लिखा, तू सच मान बैठा ! किसी राजनेता के नारे में तुम्हारी जय-जय क्या हो गई, तू अपने को खुदमुख्तार समझने लगा है! आंख खोल और देख! जिन खेतों के लिए तू मर रहा है न, उन्हीं खेतों में तेरे पुरखे खेत हुए हैं!

अच्छा यह बता तू सरकार का विरोध क्या खाकर कर रहा? किसके बल पर कर रहा है? सरकार से तेरी अनबन हो गई, तो ऐसा कौन है, जो तेरा साथ देगा? खुद पर भरोसा हो तभी कुछ करियो,किसी के कहे-सुने पर मत अइयो। आज कौन तेरे पक्ष में बोल रहे हैं! वही न, जिन्होंने कभी सत्ता में रहते हुए तेरे साथ ऐसा ही बर्ताव किया था, जो आज की वर्तमान सरकार तेरे साथ बरत रही है। जरा गौर से देख बावले!

तू अन्न पैदा करके अपने को अन्नदाता समझता है क्या! अबे ,तू अपनी जमीन पर अन्न उगा कर कौन-सा कद्दू में तीर मार लेगा। तू कम उगा या ज्यादा तेरी और करोड़ो भूखों की सेहत पर कौन सा फर्क पड़ेगा! तू सोचता है अधिक अन्न पैदा होने से देश खुशहाल होगा। देश का तो पता नहीं, अलबत्ता और अन्न उगा कर सरकार और अपनी परेशानी ही बढ़ाएगा। तेरे अतिरिक्त अन्न को रखने के लिए सरकार को अन्य गोदाम बनवाने पड़ेंगे । अरे निर्दयी, पहले से उलझी हुई सरकार का काम और क्यों बढ़ाता है!

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अबे, तू समझता क्यों नहीं! वास्तविकता से आंख मिला। देखता नहीं सरकारी गोदामों में करोड़ों टन अन्न पड़ा-पड़ा सड़ रहा है। यहां न अन्न की कद्र है, न उसको उगाने वाले की। यहां कद्र है, तो बस क्रिकेट की और क्रिकेटरों की। देखता नहीं, रत्तीभर मुआवजा मिलने के इंतजार में विस्थापितों की पहाड़ जैसी जिंदगी कट जाती है, मगर खिलाड़ियों के ऊपर ईनाम की बारिश पल भर में हो जाती है । गोबर कहीं का!

देश को तरक्की करते हुए तू क्यों नहीं देखना चाहता? उसे आत्मनिर्भरता की राह पर आगे क्यों नहीं बढ़ने देता? राष्ट्रनिर्माण की राह में ग्रहण क्यों लगाने पर तुला है? विकास की राह में रोड़ा क्यों बनता है नासपीटे? और उस विकास की राह में, जिसे बनाने के लिए सरकार पूरी तरह से कटिबद्ध है। राई है और रोड़ा बनने की जुर्रत करता है! मरेगा! और तू कोई सेलिब्रिटी नहीं जो तेरे मरने के बाद एंकर अपना गला फाड़ें और तुझे न्याय दिलाने के लिए खाना-पीना छोड़ दे! सुन ले!वहां होरी नहीं हीरो चलता है!

मेरी बात मान,तेरी अपनी बात रखने के लिए किसी से कॉन्टेक्ट मत कर ,कम्पनियों से कॉन्ट्रेक्ट कर। जमाना कारपोरेट का है। सो, कारपोरेट कर! अब देख, देश तरक्की करेगा, तो ठेकेदार भी करेगा ही। उद्योग बढ़ेगा, तो उद्योगपति भी फले-फूलेगा ही। यह एक स्वभाविक प्रक्रिया है। ऐसा ही होता आया है, ऐसा ही होता रहेगा। न तो तू कुछ कर सकता है, न ही यह सरकार। तू सरकार के ऐब न देख, तू बस वह जेब देख,जिसमें वह बैठी हुयी हैं। जब उसकी कोई हैसियत नहीं, तो तेरी क्या बिसात! तू अपनी जमीन दे , तू अपनी फसल दे, तू अपनी मंडी दे, तू अपनी हड्डी दे, अस्थिमज्जा दे,राख दे , रास्ता दे, बाजार को खुद खलीहान में आने दे और विकास का एक हिस्सा बन जा! हिस्सा! मगर तू तो विकास में से हिस्सेदारी मांग रहा है। अबे ऐसे में तुझे कौन छोडे़गा? कमबख्त, तू पिटेगा ही पिटेगा…

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अरे अपना न सही तो अपनी धनिया का तो कुछ ख़याल कर ले!
चले हो बथुआ उखाड़ने!

तुम्हारा शुभ चिंतक
सेवकराम,
गली नंबर 56
बोलपुरम
अखण्ड प्रदेश

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