ज़ीनत सिद्दीक़ी

उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां धीरे धीरे रफ़्तार पकड़ रही हैं. बीजेपी अपने कुनबे को सही करने में लगी है, सत्ता वापसी के विश्वास में समाजवादी पार्टी छोटी पार्टियों के सहयोग से चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारियां कर रही है, बहन जी की बहुजन समाजवादी पार्टी डगन लगाए बैठी है कि भाजपा जैसी तगड़ी मछली उसके कांटे में कब फंस जाय. यहाँ तक कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और ओवैसी की मीम भी यूपी चुनाव को लेकर काफी गंभीर दिख रही हैं मगर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस क्या कर रही, क्या करने वाली है और क्या सोच रही है यह बात कांग्रेसियों को भी नहीं मालूम।
दरअसल कांग्रेस पार्टी बड़े कन्फ्यूज़न में नज़र आ रही है, पिछले तीस बरसों से कांग्रेस यूपी में सत्ता से बाहर है, इतने सालों से गठबंधन करते करते उसकी हालत यह हो गयी है कि अब वह गठबंधन लायक भी नज़र नहीं आ रही है. हालाँकि अब कांग्रेस अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात तो कर रही है मगर हिम्मत नहीं जुटा पा रही है, आज भी कांग्रेस पार्टी यही चाह रही है कि कोई अच्छा सा गठबंधन हो जाय तो कुछ बात बन जाय और यही कांग्रेस पार्टी का सबसे बड़ा कन्फ्यूजन है.
कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गाँधी को जब यूपी की बागडोर सौंपी थी तो लगा था कि उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा समय तक राज करने वाली पार्टी प्रदेश में अपनी जड़ों को फिर से मज़बूत करने के लिए गंभीर है। प्रियंका वाड्रा ने भी यूपी में पार्टी को ज़िंदा करने के लिए मेहनत करनी शुरू की, प्रदेश में अपने सिपहसालार अजय कुमार लल्लू के साथ हर मुद्दे पर प्रियंका ने योगी और मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला, दोनों सरकारों की हर नाकामी को बड़ी मुखरता से जनता के सामने उठाया। कहना ग़लत नहीं होगा कि प्रियंका गाँधी द्वारा यूपी की ज़िम्मेदारी लेने के बाद विपक्षी पार्टी के रूप में समाजवादी पार्टी से कहीं अधिक मुखर कांग्रेस पार्टी रही.
अब जब लगने लगा था गाड़ी धीरे धीरे पटरी पर आ रही है, पार्टी फिर पटरी से उतरती दिख रही है. चुनाव करीब आने पर अचानक कांग्रेस पार्टी में ख़ामोशी छा गयी है, ऐसा क्यों है? यह सवाल सियासी गलियारों में बड़ी तेज़ी से गश्त कर रहा है. पिछले दिनों पार्टी के एक प्रदेश प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिया जानकारी दी थी कि यूपी में प्रियंका गाँधी वाड्रा मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगी, इस बात का एलान बस एक दो दिन में हो जायेगा, मगर आज तक वह एलान नहीं हुआ. उन प्रवक्ता महोदय से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने भी बड़ी निराशा में कहा कि पता नहीं पार्टी में क्या चल रहा. इसी सन्दर्भ में एक और घटना का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगी। 23 जून को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा है कि प्रियंका गांधी वाड्रा ही यह तय करेंगी कि यूपी विधानसभा चुनाव में वह मतदाताओं के बीच खुद को किस हैसियत से पेश करेंगी लेकिन जब उनसे यह पूछा गया कि क्या मुख्यमंत्री पद के चेहरे के लिए प्रियंका गांधी का नाम है तो उन्होंने कहा कि मैं इसका जवाब नहीं दे सकता।
सलमान खुर्शीद और उन प्रवक्ता महोदय की बातें यह साबित करने के लिए काफी हैं कि पार्टी में बड़े बड़ों को नहीं पता कि क्या होने वाला है. हर मसले को लटकाने और देर से फैसले लेने की आदत से ही कांग्रेस का ऐसा बुरा हाल हो रहा है. क्या ही अच्छा होता कि कांग्रेस पार्टी प्रियंका गाँधी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के साथ एक स्पष्ट विजन को लेकर चुनावी मैदान में उतरे ताकि किसी तरह कन्फूज़न न रहे. पार्टी कार्यकताओं को भी स्पष्ट सन्देश मिले कि उन्हें किसके लिए मेहनत करनी है और मतदाताओं को भी मालूम हो कि उन्हें किस नेतृत्व को वोट करना है. इस कन्फूज़न को पार्टी जितनी जल्दी दूर करेगी उसे प्रदेश में अपना वजूद बचाने में उतनी ही आसानी होगी। इसके साथ सच यह भी है कि सिर्फ प्रियंका गाँधी ही पार्टी को इस कन्फ्यूज़न की समस्या से निजात दिला सकती हैं.

