अमित बिश्नोई
ये नए ज़माने की भाजपा है, ये मोदी और अमित शाह की भाजपा है, यहाँ कोई बड़ा छोटा नहीं , यहाँ ज़र्रे को आफताब और आफ़ताब को ज़र्रा बनते या बनाते ज़रा भी देर नहीं लगती। यहाँ चार बार के जिताऊ मुख्यमंत्री को काम निकलने के बाद किनारे लगा दिया जाता है और पहली बार विधायक बने व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया जाता है. और मज़ाल है कि कोई चूं भी कर दे. ऐसा सिर्फ भाजपा में ही हो सकता है. आप इसे डिसिप्लिन कहिये या डर, विपक्ष के मुद्दे की काट कहिये या फिर आगे के चुनाव की तैयारी। इस तरह के फैसले सिर्फ मोदी और शाह ही ले सकते हैं।
हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में शानदार कामयाबी हासिल हुई। तीनों ही राज्यों के मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ले चुके हैं। तीनों ही राज्यों में मुख्यमंत्री के रूप में नए चेहरे हैं, तीनों ही राज्यों से क्षत्रप किनारे लगा दिए गए हैं. इन तीनों राज्यों में अगर कहीं सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला फैसला हुआ है तो राजस्थान में हुआ है। मुख्यमंत्री के रूप में यहाँ पर उस व्यक्ति को भाजपा सामने लाई है जिसने पहली बार चुनाव जीता है, उस व्यक्ति को प्रदेश का ज़िम्मेदार बनाया है जो कभी बागी के रूप में चुनाव लड़कर ज़मानत ज़ब्त करवा चुका है. जिसे पार्टी के मंचों का संचालन करते हुए देखा गया है, जिसे फ्रंट लाइन नेताओं के पीछे खड़ा हुआ पाया गया है. जी हाँ भजनलाल शर्मा की राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने से पहले यही पहचान थी. इसलिए मैंने कहा कि भाजपा में ज़र्रे को आफताब बनाया जा सकता है और ऐसा सिर्फ भाजपा में हो सकता है।
अब इसपर बहस हो सकती है कि पार्टी आला कमान ने ज़र्रे को आफताब नहीं बनाया बल्कि प्रदेश में पार्टी के उन क्षत्रपों को जो भाजपा आला कमान यानि मोदी-शाह से अपने को ऊपर समझ रहे थे, जो चुनाव से पहले दिल्ली के नेतृत्व को आँखें दिखा रहे थे , मोलतोल कर रहे थे, उन्हें सबक सिखाया. हो सकता है राजस्थान में ऐसा ही हुआ हो लेकिन इतना बड़ा फैसला लेना आसान नहीं , क्या कांग्रेस आला कमान इस तरह का फैसला ले सकता था , कभी नहीं। राजस्थान की बात ही लीजिये। सभी चिल्ला चिल्लाकर कह रहे थे कि अशोक गेहलोत से किसी को परेशानी या नाराज़गी नहीं लेकिन उनके बेलगाम मंत्रियों और विधायकों से जनता ज़रूर नाराज़ है और अगर उन्हें फिर चुनाव लड़ाया गया तो वही गेहलोत की राह का रोड़ा बनेंगे। कांग्रेस पार्टी आला कमान को भी इस बात का एहसास था, उन्होंने पूरी कोशिश भी की, पार्टी मीटिंग में नाराज़गी भी दिखाई लेकिन अशोक गेहलोत नहीं माने और ऐसे ज़्यादातर लोगों को टिकट दिलाने में कामयाब हो गए। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में गेहलोत से पंगा लेने की हिम्मत नहीं थी. नतीजा भी हार के रूप में सामने है. भाजपा तो विपक्ष में थी फिर भी कामयाब हुई, सत्ता में होती तो शायद कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ़ कर देती क्योंकि वो ऐसे मंत्रियों और विधायकों का टिकट काटने में देरी न करती जिनसे जनता नाराज़ थी, जो सरकार जाने का कारण बन सकते थे.
मध्य प्रदेश को देख लीजिये। कांग्रेस भला सोच सकती थी कि जिस मुख्यमंत्री की वजह से पांचवीं बार सत्ता मिली हो उसे किनारे लगा दिया जाय लेकिन उसने शिवराज चौहान को किनारे लगा दिया। उसने शिवराज चौहान से चुनाव के दौरान पूरी मेहनत कराई, उनकी और उनकी योजनाओं का फायदा उठाया और फिर यादव जी को मुख्यमंत्री बना दिया। अब भले ही शिवराज चौहान खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हों, अंदर अंदर ही दर्द से चाहे जितना बिलबिला रहे हों लेकिन मुंह नहीं खोल सकते। यहाँ पर आप कांग्रेस को रखकर देखिये, गेहलोत अगर सरकार बचा लेते तो क्या पार्टी आला कमान में ये हिम्मत थी कि वो सचिन पायलट या किसी और को मुख्यमंत्री बनाती, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। सभी राज्यों में अनुकूल हालात होने के बावजूद कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव क्यों हारी, शायद इसलिए कि उसमें मोदी और शाह की तरह फैसले लेने की हिम्मत नहीं थी. राजस्थान में गेहलोत की मनमानी चली, मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने दिल्ली वालों की नहीं सुनी और सपा या बसपा से हो रहे गठबंधन को ठुकरा दिया, छत्तीसगढ़ में भी टी एस सिंघदेव ने वादाखिलाफी का बदला लिया, भूपेश बघेल के दिखाए गए सुनहरे सपनो की असलियत खरगे-राहुल और प्रियंका नहीं जान पाए या जानकर भी कुछ करने की हैसियत में नहीं थे. कांग्रेस को अगर वापसी करनी है तो मोदी-शाह जैसे फैसले लेने की हिम्मत रखनी होगी, हमारी पार्टी में लोकतंत्र है की बात कहने से काम नहीं चलेगा। राजनीति करनी है तो समय के साथ करनी होगी। अपने विचार और अपने फैसले लागू करने हैं तो उसके लिए चुनाव जीतना होगा और चुनाव जीतने के लिए आपको कड़े फैसले लेने होंगे।