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‘एक देश एक चुनाव’ और निर्वाचन आयोग

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अमित बिश्नोई
करीब दो दशक में पहली बार हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव एकसाथ नहीं होंगे। इसके पीछे उसके अपने तर्क हैं जो हमेशा की तरह बड़े दिलचस्प भी हैं और सोच में डालने वाले भी. बता दें कि निर्वाचन आयोग ने आज जम्मू कश्मीर और हरियाणा विधानसभा के चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा की है, हमेशा की तरह मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार का शायराना और पीठ थपथपाने वाला अंदाज़ दिखा। उनका ये अंदाज़ देश के किसी बड़े नेता से बड़ा मेल खाता है जो खुद भी अक्सर अपनी पीठ थपथपाते नज़र आते हैं. बहरहाल प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म होने पर पत्रकारों ने जिस सवाल को कई अंदाज़ में सबसे ज़्यादा पूछा वो यही था कि जब हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल एक ही महीने में ख़त्म हो रहा है तो फिर हरियाणा के साथ महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव का एलान क्यों नहीं किया जा रहा है, इसकी वजह क्या है और क्या ये किसी विशेष पार्टी को चुनाव तैयारी के लिए अतिरिक्त समय देने का प्रयास है. बहरहाल जब ये सवाल पूछा जा रहा था तब भी और बाद में भी चीफ इलेक्शन कमिश्नर की भावभंगिमा देखने वाली थी. ख़ास बात ये रही कि उन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव एकसाथ न कराने के जो तर्क दिए वो किसी के गले नहीं उतरे और यही वजह रही कि चुनाव आयोग विपक्ष के निशाने पर आ गया और साथ ही उसके ऊपर सत्ता में बैठी सरकार के साथ मिलीभगत के भी आरोप लगने लगे जो पिछले कई वर्षों से लगातार लगते रहे हैं.

चलिए पहले जान लेते हैं कि महाराष्ट्र में हरियाणा के साथ चुनाव न कराने के लिए राजीव कुमार ने क्या तर्क दिए. पहला तर्क उनका था कि हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के कार्यकाल में 20-25 दिन का अंतर है. पिछली बार दोनों राज्यों में चुनाव 21 अक्टूबर को चुनाव कराये गए थे. उनका दूसरा तर्क था कि महाराष्ट्र में बारिश का मौसम है और कई इलाकों में बाढ़ की स्थिति है ऐसे में मतदान प्रक्रिया के प्रभावित होने की आशंका है, BLO ने अभी अपना काम नहीं पूरा किया है. इसके अलावा राज्य में त्योहारों का मौसम है. इस तर्क पर विपक्ष का कहना है कि महाराष्ट्र का मौसम हमेशा ऐसा ही रहता है और जहाँ तक त्यौहार की बात है तो वो भी हर साल होते हैं, ऐसे में पिछले दो दशकों में तो निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने में कोई समस्या नहीं आयी।

निर्वाचन आयोग का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तर्क सिक्योरिटी फोर्सेज को लेकर था। राजीव कुमार का कहना है कि इसबार जम्मू कश्मीर में भी चुनाव हो रहे हैं इसलिए वहां पर सुरक्षा बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती होगी। पिछले दो चुनावों में जम्मू कश्मीर में चुनाव का कोई मुद्दा नहीं था, इसलिए महाराष्ट्र और हरियाणा में सुरक्षा को लेकर कोई समस्या नहीं थी. इसीलिए चुनाव आयोग ने सिर्फ दो राज्यों में एकसाथ चुनाव कराने का अपना तर्क दिया है. दरअसल निर्वाचन आयोग का यही तर्क उसके गले की फांस बन गया. अभी एकदिन पहले ही देश के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से एक देश एक चुनाव की बात कर रहे थे, इस मुद्दे पर उन्होंने काफी लम्बी चौड़ी बात कही थी और विपक्ष से भी अपील की थी वो इस मुद्दे पर सरकार का साथ दे और साथ विपक्ष पर आरोप भी लगाया था कि वो नहीं चाहता कि देश में लगातार चलने वाली चुनाव की परंपरा ख़त्म हो, वो चाहता है कि देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहें, क्योंकि उसका मकसद सिर्फ राजनीती करना है, उसे देश के विकास से कोई मतलब नहीं।

चीफ इलेक्शन कमिश्नर भी वन नेशन वन इलेक्शन के पैरोकार है और सरकार की इस बात से सहमत है कि पूरे देश में एक साथ चुनाव होने चाहिए लेकिन यहाँ तो मामला ही है अलग है, पूरे देश को तो छोड़िये तीन राज्यों के चुनाव कराने में भी निर्वाचन आयोग असमर्थ है. तो फिर देश के प्रधानमंत्री हों या फिर देश का निर्वाचन आयोग किस मुंह से एक देश एक चुनाव की बात करता है. माना कि जम्मू कश्मीर के हालात अन्य राज्यों से अलग हैं और इसलिए वहां पर तीन चरणों चुनाव की बात कही गयी है जो बिलकुल ठीक है लेकिन क्या निर्वाचन आयोग के पास इतने भी संसाधन नहीं है कि वो एक और राज्य में चुनाव करा सके. कल्पना कीजिये कि अगर सभी दल एक देश एक चुनाव की बात पर राज़ी हो जांय तो फिर निर्वाचन आयोग क्या करेगा। लोकसभा चुनाव उसने सात चरणों में और दो महीने की अवधि में कराया, ऐसे में पूरे देश की हज़ारों विधानसभा सीटों का चुनाव वो कितने महीनों और कितने चरणों में कराएगा?

महाराष्ट्र के चुनावों को लेकर उसने जो तर्क दिए हैं वो एकदम बकवास हैं। हिंदुस्तान जैसे विविधता वाले देश में जहाँ हर क्षेत्र का मौसम अलग रहता है, त्यौहार भी अलग होते हैं. अगर ऐसे ही देखा जाय तो पूरे देश में एकसाथ चुनाव कभी हो नहीं सकते हैं, कम से कम इस निर्वाचन आयोग की जो सोच है और जो कार्यशैली, उसे देखते हुए तो कहा जा सकता है कि बिलकुल भी नहीं। हालाँकि पहले देश में एक साथ चुनाव हो चुके हैं और तब न इतने महीने लगते थे और न ही इतने दौर होते थे और तब EVM मशीन नहीं बल्कि बैलेट पेपर होता था. इंटरनेट भी नहीं था और न ही कोई डाटा अपलोड करने का सिस्टम, सबकुछ मैन्युअल ही होता था. ऐसे में अगर विपक्ष निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है तो क्या गलत कर रहा है, अगर वो कह रहा है कि निर्वाचन आयोग महाराष्ट्र में महायुति सरकार को अपनी कुछ लोकलुभावन योजनाएं जो हाल ही में लागू की गयी हैं उन्हें जनता तक पहुँचने के लिए कुछ समय देना चाहता है तो उसके आरोप में पूरा दम है. निर्वाचन आयोग ने आज जो तर्क दिए हैं उसके बाद उसे यही सलाह दी जा सकती है कि एक देश एक चुनाव की बात वो न ही करे तो अच्छा है।

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