रंजीता सिन्हा
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती की उस सोशल इंजीनियरिंग वाले फार्मूले को यूपी का राजनीतिक इतिहास कैसे भुला सकता है जब 2007 में बहुमत के साथ बसपा सत्ता में आयी थी। सतीश चंद्र मिश्र को हमसाया बनाकर जिस तरह बहनजी ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का अनोखा प्रयोग किया, उससे उस वक्त ब्राह्मणों की पार्टी कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी भी स्तब्ध रह गई। चर्चा है कि यूपी के ब्राह्मणों में नाराजगी का अंडरकरेंट है। संभव है बीते दिनों यूपी मेें नेतृत्व परिवर्तन का उपजा माहौल भी इसी अंडरकरेंट के चलते रहा हो। ऐसे में साल 2022 के चुनाव में यही अंडरकरेंट कहीें एक बार फिर बीजेपी को झटका न दे दे, कांग्रेस से तोड़कर लाये गये जितिन प्रसाद उसी की काट समझिये। जाहिर है जितिन वो बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं जो खानदानी राजनीतिज्ञ हैं और यूपी की नब्ज टटोलना भी जानते हैं।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब हैं। चुनाव फरवरी 2022 में हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव अभी तीन साल दूर हैं। ऐसे में जितिन प्रसाद के लिए विधानसभा चुनाव एक ऐसा मौका है जब वह यूपी की राजनीति में ख़ुद को जमाए रखने के साथ-साथ भविष्य के पॉलिटिकल कॅरियर को भी मनमुताबिक साध सकते हैं। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं। जितिन ने उनकी विरासत को ही संभाला है। उन्होंने 2004 और 2009 में लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीता।
लेकिन उसके बाद से चुनावी राजनीति में वो कोई करिश्मा नहीं कर पाए हैं। पार्टी ने भी हाल-फिलहाल उन्हें जो जिम्मेदारी दी है, वहां वो उम्मीद के मुताबिक नतीजे देने में नाकाम रहे हैं। पश्चिम बंगाल में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में जितिन प्रसाद कांग्रेस के प्रभारी थे जहां कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। यह बात अलग है कि, पश्चिम बंगाल में लड़ाई सीधी ममता बनर्जी की पीएम नरेंद्र मोदी के बीच थी, जहां जितिन प्रसाद के पास बहुत कुछ कर दिखाने का मौका नहीं था।
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संभवत: इसी कारण जितिन प्रसाद अब अपने कॅरियर को डूबने से पहले कुछ कर दिखाना चाहते हैं और इसके लिए अपने घर के राजनीतिक मैदान उत्तर प्रदेश से बेहतर और क्या होगा? सीएम योगी आदित्यनाथ ने तो उनका पार्टी में स्वागत करते हुए यह कह ही दिया कि जितिन प्रसाद कारण उत्तर प्रदेश में बीजेपी मजबूत होगी। यानि इतना तो तय है कि जितिन को केन्द्रीय राजनीति का चेहरा नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति का वो चेहरा बनाया जाने वाला है जो पीएम मोदी के चेहरे पर आंच न आने दे। जैसी कि रणनीति आने वाले वक्त में मोदी के बजाय क्षेत्रीय नेताओं के चेहरे पर ही चुनाव लड़े जाने की तैयार हुई है।
भाजपा की नजर से देखा जाय तो पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस ने मोदी की इमेज मुसलमान विरोधी बनाने की रणनीति अपनाई। इससे मुसलमान वोटर एकजुट हो गए और 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमानों ने तृणमूल कांग्रेस को वोट देकर चुनाव नतीजों को एकतरफा कर दिया। पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश में भी मुसलमानों आबादी खासी है और करीब 75 सीटों पर वे चुनावी नतीजों पर असर भी डाल सकते हैं। ऐसे में मोदी को चेहरा बनाने पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस फिर से मुसलमानों को एकजुट करने में कामयाब हो सकती हैं। हालांकि, यूपी का जातिगत समीकरण पश्चिम बंगाल से कहीं जुदा है और यहां केवल मुस्लिम वोटबैंक के कारण ही किसी पार्टी की हार-जीत तय नहीं होगी। इसके लिए यहां सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाना ही किसी भी दल के लिए बेहतर होगा। अब इसी इंजीनियरिंग के मद्देनजर बीजेपी जितिन प्रसाद के रूप में ब्राह्मण चेहरा लाने के बाद कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा भी सामने ले आये तो आश्चर्य न होगा।
बहरहाल, ममता बनर्जी की टीएमसी के दिग्गज चेहरे पश्चिम बंगाल में बहुतेरे बीजेपी के साथ जुड़े पर परिणामों ने भाजपा को झटका दे दिया। अब उत्तर प्रदेश में ऐसे चेहरे किस भूमिका में आते हैं और सोशल इंजीनियरिंग को कितना साध पाते हैं, यह तो वक्त ही तय करेगा।

