तौकीर सिद्दीक़ी
उत्तर प्रदेश नजूल संपत्ति विधेयक को राज्य विधानसभा द्वारा पास किए जाने के एक दिन बाद इंडिया गठबंधन और भाजपा सदस्यों के कड़े विरोध के बीच एक बिल को समीक्षा के लिए चयन समिति को भेज दिया गया। कई भाजपा विधायकों के साथ-साथ एनडीए के सहयोगी भी इस विधेयक के खिलाफ हैं. ये बिल विधानसभा में तो योगी आदित्यनाथ ने पास करा लिया लेकिन विधान परिषद् में ये बिल अटक गया और बताया जा रहा है कि बिल अटकाने में भाजपा सदस्यों की ही भूमिका थी. विधान परिषद् में नुज़ूल बिल अटकने के बाद एक बार फिर प्रदेश में उन राजनीतिक चर्चाओं को बल मिला जो भाजपा के अंदर योगी आदित्यनाथ को लेकर मची कलह को लेकर चल रही थीं. इस बिल के अटकने को भी योगी विरोध की राजनीती से जोड़ा जाने लगा है.
आगे बढ़ने से पहले चलिए जान लेते हैं कि नजूल संपत्ति विधेयक, 2024 है क्या?, उत्तर प्रदेश नजूल संपत्ति विधेयक, 2024 का उद्देश्य नजूल भूमि को निजी स्वामित्व में बदलने से रोककर उसका विनियमन करना है। नजूल भूमि सरकारी स्वामित्व वाली है, लेकिन इसका प्रबंधन सीधे राज्य की संपत्ति के रूप में नहीं किया जाता है। आसान भाषा में यह वह भूमि है जिसे सरकार नियंत्रित करती है और सार्वजनिक उद्देश्यों, जैसे कि बुनियादी ढाँचे या प्रशासनिक कार्यालयों के निर्माण के लिए उपयोग करती है। इस विधेयक में प्रस्ताव दिया गया है कि नजूल भूमि को निजी व्यक्तियों या संस्थानों को ट्रांसफर करने के लिए कोई भी अदालती कार्यवाही या आवेदन खारिज कर दिया जाएगा जिससे यह यकीनी हो सके कि ये ज़मीन सरकारी कंट्रोल में रहे। अगर मिलकियत में बदलाव की डर में भुगतान किया गया था, तो बिल जमा तिथि से भारतीय स्टेट बैंक के MCLR पर गणना की गई ब्याज की रकम के साथ रिफंड को अनिवार्य करता है। ये बिल सरकार को वर्तमान पट्टेदारों के लिए पट्टे को बढ़ाने की शक्ति देता है, जो नियमित रूप से किराया देते हैं और पट्टे की शर्तों का पालन करते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि अनुपालन करने वाले पट्टेदार सरकारी संपत्ति के रूप में इसे बनाए रखते हुए भूमि का उपयोग जारी रख सकते हैं। नुज़ूल विधेयक का उद्देश्य भूमि प्रबंधन को अनधिकृत निजीकरण को रोकना है।
अब आते हैं इस बात पर कि अपनी सरकार द्वारा लाये गए विधेयक जो कि विधानसभा से पास भी हो चूका है उसका विरोध विपक्षी विधायकों के अलावा योगी जी की अपनी ही पार्टी के विधायक क्यों कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी तो इस विधेयक के विरोध में ये तर्क दे रही है कि नजूल भूमि पर रहने वाले गरीब परिवारों और समुदायों के लिए नुकसानदेह है। उसका ये भी तर्क है कि बिल के सख्त प्रावधान जो नजूल भूमि को निजी मिलकियत में बदलने से रोकते हैं, लंबे समय से रहने वाले परिवारों को बेदखल कर सकते हैं, जिससे पीढ़ियों से इन जमीनों पर रह रहे और निवेश कर रहे लोगों के लिए काफी कठिनाई हो सकती है। विपक्ष यह भी चिंता जाता रहा है कि इस विधेयक के कारण कई वर्षों से बने घरों पर बुलडोज़र चल सकता है साथ ही वह पर रहे उन लोगों का विस्थापन हो सकता है जो अपनी आजीविका के लिए इन ज़मीनों पर निर्भर हैं।
विपक्ष के अलावा भाजपा विधायकों ने भी इस विधेयक के नज़रिये पर आपत्ति जताई है, उनका तर्क है कि यह वर्तमान में नजूल भूमि पर निवासियों की व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में नहीं रखता है। विधेयक विरोधी भाजपा विधयकों का मानना है कि नजूल की ज़मीन को निजी मिलकियत में तब्दील करने से रोकने के विधेयक का सख्त रुख वर्तमान पट्टेधारकों के वैध दावों और जरूरतों को स्वीकार करने में विफल रहता है। भाजपा विधायक हर्षवर्धन बाजपेयी का तर्क है कि नया कानून प्रयागराज में झुग्गी-झोपड़ियों की बस्ती में रहने वाले लोगों समेत लंबे समय से रहने वाले नजूल की ज़मीन पर रहने वालों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा। उनका मानना है कि इससे उन परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा जो अंग्रेज़ों के ज़माने से इन जमीनों पर रह रहे हैं। इसी तरह भाजपा के सहयोगी दल अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल भी इस बिल को गैरज़रूरी और जन भावनाओं के ख़िलाफ़ बताती हैं।
अब जबकि इस बिल के विरोध में भाजपा के अपने लोग ही मैदान में उतर गए हैं तो सरकार को भी सफाई देनी पड़ रही, वरना योगी सरकार सफाई देने या फिर अपने कदम से पीछे हटने वाली नहीं मानी जाती लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद से ये लगातार देखा जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने बढ़ाये क़दमों से या तो पीछे हटना पड़ा है या फिर उन्हें रोकना पड़ा है. कुछ दिनों पहले भी टीचर्स की बायोमेट्रिक अटेंडेंस पर उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा था और आदेश को ठन्डे बास्ते में डालना पड़ा था, वैसे ही अकबरनगर की बस्ती को पूरी तरह से नेस्तोनाबूद कर देने वाले मुख्यमंत्री योगी को कुकरैल प्रोजेक्ट के तहत आने वाली दूसरी कालोनियों के मकानों पर लाल निशान लगाने के बावजूद बढ़ते विरोध के बीच अपने बुलडोज़रों को शांत रहने का आदेश देना पड़ा था और अब नुज़ूल विधेयक पर विपक्ष के साथ उनके अपनों के विरोध का उन्हें सामना करना पड़ा है और मजबूर होकर बिल को समीक्षा के लिए एक चयन समिति को भेजना पड़ा है. देखा जाय तो योगी के लिए इन दिनों कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा है. उनके आदेशों और निर्देशों पर बवाल मच रहा और उस बवाल पर उन्हें अपने पाँव खींचने पड़ रहे हैं फिर वो चाहे दुकानों पर नेम प्लेट लगाने पर सुप्रीम कोर्ट से पड़ी फटकार हो या फिर उनके अपनों द्वारा ही नुज़ूल विधेयक का विरोध।
