“मैं भी कॉकरोच हूं” बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक वादों, सामाजिक असमानता और समाज में खत्म होती संवेदनाओं जैसे गंभीर विषयों को मंच पर लाने का प्रयास करेगा।
नाटक के पोस्टर पर लिखी पंक्ति “विचारों की तेरहवीं के उपलक्ष्य में” — लोगों के बीच उत्सुकता का विषय बनी हुई है।
9 जुलाई को प्रस्तावित है इस चर्चित नाटक का मंचन
न्यूज डेस्क – समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित अपने प्रभावशाली नाटकों के लिए पहचाने जाने वाले लेखक एवं निर्देशक मुकेश वर्मा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। उनका नया नाटक ‘मैं भी कॉकरोच हूं’ इन दिनों रंगमंच जगत और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों के बीच विशेष आकर्षण का विषय बना हुआ है। हाल ही में इस नाटक का पोस्टर लॉन्च किया गया, जिसके बाद इसकी विषयवस्तु और संदेश को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। नाटक का मंचन आगामी 9 जुलाई 2026 को प्रस्तावित है, हालांकि आयोजन स्थल की घोषणा अभी नहीं की गई है।
पोस्टर में लिखी गई पंक्ति ‘विचारों की तेरहवीं के उपलक्ष्य में’ लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यह पंक्ति नाटक की वैचारिक गंभीरता और सामाजिक संदेश का संकेत देती है। पोस्टर लॉन्च होने के बाद रंगमंच प्रेमियों, साहित्यकारों और सामाजिक चिंतकों के बीच नाटक की अवधारणा को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है।
मुकेश वर्मा ने बताया कि ‘मैं भी कॉकरोच हूं, केवल मनोरंजन के उद्देश्य से तैयार किया गया नाटक नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने एक ऐसा आईना रखने का प्रयास है, जिसमें वर्तमान समय की विसंगतियां, संवेदनहीनता और नैतिक पतन साफ दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि कला और साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज को सोचने के लिए मजबूर करना भी है। इसी सोच के साथ इस नाटक की रचना की गई है।
नाटक की कहानी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसे विषयों के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके माध्यम से यह सवाल उठाया गया है कि जब समाज में संवेदनाएं मरने लगती हैं और इंसान अपने कर्तव्यों व मूल्यों से दूर हो जाता है, तब वास्तविक ‘कॉकरोच’ कौन होता है। नाटक दर्शकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने का प्रयास करता है और सामाजिक जिम्मेदारियों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
मुकेश वर्मा लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर आधारित नाटकों का लेखन और निर्देशन करते रहे हैं। उनके चर्चित नाटकों में ‘गंगा यात्रा’, ‘सत्याग्रह-1’, ‘सत्याग्रह-2’, ‘अयोध्या में रावण’, ‘अन्ना मेरा बाप’, ‘बन्नो’, ‘पंचवटी’, ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि’, ‘महामृत्युंजय’ और ‘माई सैंडल’ जैसे नाटक शामिल हैं। वर्ष 2011 में उनके नाटक ‘माई सैंडल’ को तत्कालीन मायावती सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिंदी फीचर फिल्म ‘मल्लाह’ का निर्देशन भी किया है।
नाटक के पोस्टर लॉन्च के बाद रंगमंच से जुड़े कई लोगों ने इसे वर्तमान समय की जरूरत बताया है। उनका मानना है कि ऐसे नाटक समाज में संवाद और जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं। अब दर्शकों को 9 जुलाई का इंतजार है, जब यह बहुचर्चित नाटक मंच पर अपनी बात कहेगा और समाज के सामने कई असहज लेकिन जरूरी सवाल रखेगा।
