…..अब देश को डराती बेरोज़गारी की लहर

आर्टिकल/इंटरव्यू…..अब देश को डराती बेरोज़गारी की लहर

Date:


…..अब देश को डराती बेरोज़गारी की लहर

-फरीद वारसी

…..अब देश को डराती बेरोज़गारी की लहर

राहत की बात है कि देश में कोरोना की दूसरी लहर अब उतार पर है जिसके बाद विभिन्न राज्यों द्वारा लाॅकडाउन में दी जा रही ढ़ील के बाद अब यह उम्मीद की जा रही है कि जिन्दगी पटरी पर लौटनी शुरू हो जाएगी। पर इसी के साथ एक दुखद खबर देश की गिरती अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी से संबंधित आने से लोगों का खासतौर से आम व कमजोर वर्ग का चितिंत होना स्वाभाविक है। गौरतलब है कि सेंटर फाॅर इंडियन इकनाॅमी की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना की दूसरी लहर ने देश में पहले से ही फिसलती अर्थव्यवस्था की रीढ़ी ही तोड़ कर रख दी है। जिससे विकास दर -7.3 प्रतिशत पर ही लुढ़क गई। माना जा रहा है कि देश अर्थव्यवस्था को पिछले 40 सालों के बाद यह बड़ा झटका लगा है। सिर्फ इतना ही नहीं कोरोना की दूसरी लहर ने बेरोजगारी को भी व्यापक स्तर पर बढ़ाने का काम किया। मालूम हो कि देश में पिछले काफी समय से जिस तरह अर्थव्यवस्था की स्थिति गंभीर और चिंताजनक बनी हुई थी, यही हाल लगभग बेरोजगारी का भी है। सेंटर फाॅर इंडियन इकनाॅमी की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना के कारण करीब एक करोड़ लोग बेरोजगार हो गए हैं। बीते महीने मई में बेरोजगारी की दर करीब 12 प्रतिशत के करीब पहुंच गई जो उससे पहले अप्रैल के महीने में 8 प्रतिशत ही थी। यहां यह बताते चले कि जब पिछले साल बिना किसी तैयारी के देश पर प्रधानमंत्री द्वारा लाॅकडाउन थोपा गया था तब जून 2020 में बेरोजगारी दर 23.5 प्रतिशत पहुंच गई थी। इस तरह कोरोना महामारी की शुरूआत से लेकर अब तक लगभग 97 प्रतिशत परिवारों की आय घट गई। पिछले साल लाॅकडाउन के बाद मजदूरों और कामगारों की आई भयावह तस्वीरों ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया था। वैसे यह माना जा रहा है कि जब लाॅकडाउन पूरी तरह से हटेगा तब उसके बाद अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी पर कोरोना की मार कितनी पड़ी इसका वास्तविक रूप से आकलन हो सकेगा। लेकिन इसके बाद भी संेटर फाॅर इंडियन इकनाॅमी की ओर से जो आंकड़े जारी हुए हैं वे ही शरीर में कंपन पैदा करने के लिए पर्याप्त हैं।

बहरहाल, उपरोक्त आंकडे उस वक्त आए जब अभी पिछले दिनों मोदी सरकार के कार्यकाल की दूसरी वर्षगांठ हुई। अगर कोरोना ने देश में भारी तबाही न मचाई होती तो मोदी सरकार की दूसरी वर्षगांठ का जश्न भव्य तरीके से कई दिनों तक सारे देश में मनाया जाता और इस दौरान कितना पैसा पानी की तरह बहाया जाता उसका कोई अनुमान ही नहीं लगा सकता और मोदी सरकार के कसीदे पढ़ने से लेकर उसका यशगान करने तक गोदी मीडिया का जो फूहड़ प्रदर्शन होता वह भी अपने आप में कम शर्मनाक न होता। खैर, ऐसा कुछ तो नहीं हुआ लेकिन दूसरी वर्षगांठ के मौके पर प्रधानमंत्री स्वयं अपनी और अपनी सरकार की पीट थपथपाते हुए नजर आए। वे यह राग अलापते हुए नजर आए कि जो काम पिछले 70 सालों में नहीं हुआ वह उनकी सरकार ने सात साल में कर के दिखा दिया। अच्छा होता कि इस तरह का ढ़िढोरा पीटने से पहले प्रधानमंत्री कोरोना के दूसरे कालखंड में हुई अपनी सरकार की घोर विफलता का आकलन कर लेते कि पिछले 70 सालों में पहली बार श्मशान घाटों में शवों के अंतिम संस्कार के लिए लंबी-लंबी लाइने लगीं, टोकन बंटे। गंगा में शवों की बहती तस्वीरें सारी दुनिया और देश ने देखी। बाकी लचर चिकित्सा तंत्र के बारे में क्या लिखा जाए वहां के हालात से जुड़ी समाचारों से सारेे देश के लोग अवगत हुए।

वहीं दूसरी ओर अब सेंटर फाॅर इंडियन इकनाॅमी की ओर से लुढकती अर्थव्यवस्था और भयावह होती बेरोजगारी के मुद्दे पर जो चिंताजनक आंकडे जारी किए गए हैं भले ही वे कोरोना के कारण ही हुए हों लेकिन इसके लिए भी मोदी सरकार ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। मालूम हो कि यह वही नरेद्र मोदी हैं जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में सारे देश में घूम-घूमकर चुनाव प्रचार करते हुए युवाओं से वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद वे हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देगें। क्या हुआ उनके इस वादे का? दूसरे अन्य वादों की तरह यह भी एक जुमला साबित हुआ कि नहीं। तभी तो खुद अमितशाह भी कुछ दिन पहले इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि चुनाव जीतने के लिए इस तरह की जुमलेबाजी की जाती है। ऐसे में राहुल गांधी अगर यह कहते हैं कि यह जुमलेबाजों की सरकार है तो क्या गलत कहते हैं। मलायम सिंह ने भी एक बार कहा था कि झूठे वादे करना भी एक तरह का भ्रष्टाचार है तो मोदी सरकार इस लिहाज से दूध की धुली या पाक साफ तो हुई नहीं। जो मजबूत अर्थव्यवस्था डाॅ. मनमोहन सिंह की यूपीए सराकर छोड़कर गई थी, उसे कायम रखना तो दूर की बात कहा जाता है कि मोदी सरकार ने अपनी गलत नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था को और भी चैपट करने का काम किया। जीडीपी के मामले में आज बांग्लादेश हमसे आगे निकल गया। जल्दबाजी में की गई नोटबंदी और गलत तरीके से लागू की गई जीएसटी का उदारण सबके सामने है। उस पर से शर्मनाक यह कि एक नया शगूफा छोड़ते हुए प्रधानमंत्री द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डाॅलर के बनाने की बात की गई। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर ईमानदारी के साथ देश की फिसलती अर्थव्यवस्था, विकराल होती बेरोजगारी और लगातर बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर गंभीरता से काम किया गया होता तो शायद कोरोना की दूसरी लहर के बाद अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी के ताजातरीन आंकडे देशवासियों को डराने का काम न करते जो बढ़ती महंगाई के कारण पहले से ही हाल से बेहाल है। पेट्रोल-डीजल के निरंतर बढते दामों के साथ-साथ अब खादय तेलों के दाम जिस तरह से बढ़ रहे हैं उससे आम आदमी का ही तेल निकला जा रहा है। अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे पर मोदी सरकार की घोर नाकामी का सबसे बड़ा कारण यह माना जाता है कि मौैजूदा मोदी सरकार के पास किसी काबिल अर्थशास्त्री का न होना। जिसके बारे में भाजपा नेता और संघ के करीबी सुब्रामण्यम स्वामी तक भी कह चुके हैं। दिवंगत वितमंत्री रहे अरूण जेटली हों अथवा कुछ समय के लिए कार्यवाहक वितमंत्री रहे पीयूष गोयल या फिर वर्तमान वितमंत्री निर्मला सीतारमण को ही ले सब के सब अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में असफल ही साबित हुए हैं। वितमंत्री निर्मला सीतारमण के आम बजट की आलोचना तो स्वयं उनके पति तक कर चुके हैं। वैसे मोदी सरकार के पास भले ही अर्थशास्त्र के अच्छे जानकार न हो लेकिन सांप्रदायिक राजनीति करने वाले और नफरत भरे बयान देकर देश के भाईचारे को नष्ट करने वाले बड़े-बड़े नाम जरूर हैं और यही कारण है कि इन नामों को आगे रख मोदी सरकार और भाजपा लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने का काम करती है और यही उसकी चुनाव जीतने की रणनीति है। लेकिन क्या यही रणनीति इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सफल हो पाएगी, कम से कम भाजपा और संघपरिवार के शीर्ष नेतृत्व की प्रकट होती बेचैनी तो कुछ और ही इशारा कर रही है।

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related