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Challenging The Places Of Worship Act: अब रिटायर्ड कर्नल ने दी प्लेसेस ऑफ़ वरशिप कानून को चुनौती

विवादित धर्म स्थलों  को लेकर सरकार ने 1991 में एक कानून बनाया था कि बाबरी मस्जिद को छोड़कर 1947 के पहले के जितने भी दूसरे धर्मस्थल हैं उनके स्वरुप में कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, जो जहाँ पर जिस स्थिति में है उसकी यथास्थिति बरकरार रहेगी। अब उसी कानून को लेकर देश भर में बहस छिड़ी हुई है। अदालतों में याचिकाएं दाखिल कर इस कानून में संशोधन या इसे रद्द कर कोई और कानून बनाने की मांग की जा रही है, सुप्रीम कोर्ट में पहले से दाखिल इस मामले में एक याचिका पर शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी की हुई है, अब इसी सम्बन्ध में एक रिटायर्ड कर्नल की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की गयी है कि इस कानून को रद्द किया जाय क्योंकि यह एक्ट हिन्दुओं के मौलिक अधिकारों का हनन करता है। 

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1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग लड़ चुके रिटायर्ड कर्नल अनिल बत्रा ने अपनी याचिका में कहा है कि यह कानून अवैध तरीके से पौराणिक पूजा स्थलों जिन्हें मुग़ल आक्रमणकारियों द्वारा कब्ज़ा कर अपनी इबादतगाहें का रूप दिया उसे कानूनी दर्जा देता है, याचिका में कहा गया कि ज़ोर ज़बरदस्ती से छीनकर बनाई गयी ईमारत को इबादतगाह नहीं कहा जा सकता है।  

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वहीँ जमीअतुल उल्माए हिन्द अरशद मदनी गुट ने वरशिप एक्ट को चैलेन्ज करने वाली याचिकाओं के खिलाफ एक याचिका दाखिल है। याचिका में शीर्ष अदालत से कहा गया है कि अगर अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई की तो देश की अनेकोंनेक मस्जिदों के खिलाफ मामलों की बाढ़ आ जाएगी। याचिका में कहा गया है कि कानून को इतिहास में जाकर एक टूल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और न ही ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा जा सकता है।

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