अमित बिश्नोई

राजनीति मेें भी आरोपों का हथौड़ा तब चलाया जाता है जब सियासत का लोहा गरम हो… और ऊपर से चुनाव भी करीब हों तो क्या कहने। राजनीति की नब्ज परखने वाले इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के जमीन की खरीद में घोटाले का इन दिनों गरमाया मुद्दा कुछ ऐसा ही समझिये। प्रभु श्रीराम को लेकर आस्थावान जनमानस में भावुकता है, लेकिन राम के नाम पर हो रही कथित घोटाले से भी आमजन इत्तेफाक रखता है, इसमें शक है। अब लोग समझते हैं- घपले-घोटालों के आरोप बरसों-बरस जांच की पटरियों पर बस रेंगते ही रहते हैं। कार्रवाई कब, किस पर और किस रूप में होती है…इसे भला आमजन को क्या मतलब, लेकिन राजनीतिक दल इस दौरान अपनी-अपनी सियासती रोटियां अवश्य सेंक लेते हैं। यूपी विधानसभा चुनाव को भी महज 6-7 महीने बचे हैं, ऐसे में विपक्ष की कोशिश अगर एक भावानात्मक मुद्दे को गरमाने की है, तो इसमें आश्चर्य नहीं।
हकीकत तो यह है कि, कई बरसों से राम मंदिर के नाम पर जमीन के खरीद-फरोख्त की डील चल रही है। जाहिर है समय बीतने के साथ और बाद में कोर्ट से राम मंदिर निर्माण को हरी झंडी मिलने के बाद बने श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के मार्फत कुछ मुख्य धारा में आये होंगे और कुछ इससे अलग हो गये होंगे। संभवत: यही आपसी मन-मुटाव, खींचतान जमीनों के खरीद-फरोख्त के कागजी सबूतों के रूप में अब सामने आ रहे हैं। ऐसे सबूत न तो आनन-फानन में राजनीतिक दलों के हाथ लगे होंगे न ही आनन-फानन में आरोप लगाये गये होंगे। पहले कोरोना से मची हाय-तौबा के ठंडा पड़ जाने का इंतजार किया गया होगा। वर्ना मुद्दा कहीं कोरोना के आगे सुर्खियां ही न बन पाता। अब चूंकि कोरोना का मसला शांत है और इस बीच यूपी इलेक्शन भी सिर पर है, सो लोहा गरम तो हथौड़ा चलाने के लिए गरम हो ही चुका था। हंगामाखेज नतीजा सबके सामने है।
बहरहाल, जहां विपक्षी दल पूरे मामले में जांच और कार्रवाई की मांग कर रहे हैं वहीं, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने आरोपों का खंडन किया है। ट्रस्ट की ओर से जमीन को ज्यादा कीमत पर खरीदने के लगे आरोपों को निराधार बताते हुए एक-एक पॉइंट्स पर सफाई दी गई है। जारी किए गए बयान में कहा गया है कि बाग बिजेसी में जिस जमीन को लेकर विवाद हो रहा है वह बहुत प्राइम लोकेशन है। भविष्य में यहां से चार लेने की सड़क मंदिर की ओर निकलेगी। यह जमीन 1.2080 हेक्टेयर है। इसे 1423 रुपये पर स्कॉयर फीट पर खरीदा गया है जो अयोध्या में इस इलाके के जमीन की वास्तविक दरों से बहुत कम है। सारे अग्रीमेंट और मालिकाना हक में करीब 9 व्यक्तिगत तौर पर लोग शामिल थे, जिन्होंने बीते 10 सालों में अग्रीमेंट किया, इनमें से तीन मुसलमान थे। बिना समय बर्बाद किए इसे खरीद लिया गया। यह बहुत जल्दी किया गया, लेकिन पूरी पारदर्शिता बरती गई।
इस मसले पर श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का कहना है, इस जमीन की कीमत 1,423 रुपये प्रति स्क्वायर फीट है, जो कि मार्केट रेट की तुलना में काफी कम है। सरकारी टैक्स का दुरुपयोग न हो इससे बचने के लिए हमने नेट बैंकिंग से पैसे का लेनदेन किया। जमीन घोटाले के आरोप गलत हैं। विश्व हिन्दू परिषद तो आरोप लगाने वालों पर मानहानि दायर करने की चेतावनी दे रहा है।
कुलमिलाकर आग लग चुकी है, धुआं गहराता जा रहा है। यानि अब रोटियां सिंकनी शुरु हो जाएंगी। हर कोई राम नाम को भुनाने की कोशिश करेगा। कितना बढ़ेगा विवाद और कब तक चलेगा, यह तो वक्त ही तय करेगा। …और यह भी कि, इसका राजनीतिक फायदा आने वाले यूपी के विधानसभा चुनाव में किस राजनीतिक दल को मिलेगा, मिलेगा भी या नहीं?
क्या हैं आरोप
श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट, अयोध्या की तरफ से खरीदी गई जमीन में घोटाले का आरोप है। आरोप आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह और अयोध्या के पूर्व विधायक और समाजवादी पार्टी नेता पवन पांडे ने लगाया है। इनमें कहा गया है कि जमीन का सौदा पहले 2 करोड़ रुपये में तय हुआ, लेकिन इसे 18.50 करोड़ रुपये में खरीदा गया।

