Wasim Rizvi उर्फ जितेंद त्यागी ने जताई आत्महत्या की इच्छा, महामंडलेश्वर के किनारा करने पर बया किया दर्द

 
Wasim Rizvi

लखनऊ। शिया मुस्लिम बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने सनातन धर्म अपनाया और अपना नाम जितेंद्र त्यागी रख लिया था। उन्हें हिन्दू धर्म में आकर क्या मिला! इसका जवाब शंकराचार्यों, महामंडलेश्वरों और अखाड़ों को देना चाहिए? रिजवी कुरान पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में जेल काट रहे हैं। बाहर आएंगे तो किसी दिन सर तन से जुदा की धमकी भी मिल सकती है। आज कोई मठाधीश उनकी सुध नहीं ले रहा। जिस दोयम दर्जे की कथित धर्मसंसद में उन्होंने आपत्तिजनक भाषण दिया। उन्होंने भी वसीम का साथ छोड़ दिया है। वह दिन भी दूर नहीं जब उनका परिवार बर्बादी की गर्द में छिप जाएगा। ऐसे में सनातनधर्म में लौटने का ख़्वाब फिर कोई नहीं देखेगा। 

बीमारी के कारण तीन महीने इलाज कराकर वसीम रिजवी लौटे तो काफी उदास थे। उन्होंने अपना दर्द बताया और स्वीकार किया कि सबने किनारा कर उनके हाल पर छोड़ दिया। बेहद मायूस जितेंद्र त्यागी ने आत्महत्या की इच्छा जताई। उनकी बिखर रही मानसिकता यदि उन्हें एक बार फिर इस्लाम में वापस ले जाए तो यह कोई आश्चर्य नहीं होगा।  बड़े अखाड़ों, सैकड़ों आश्रमों और अध्यात्म की भूमि पर वसीम रिजवी अकेले नहीं। जो धर्म बदलकर उपेक्षा का यह दंश भोगने के लिए विवश हैं।  हम धर्म परिवर्तन को ऐच्छिक मानते हैं। प्रलोभन से धर्म बदलवाना अपराध है, स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन संविधान सम्मत है। हाल में आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने कहा था कि भारत के मुसलमानों का डीएनए एक जैसा है। उनकी बात मानकर यदि कोई मुस्लिम, हिन्दू धर्म में वापस आए तो संघ परिवार उसके साथ क्या खड़ा होगा? वसीम रिज़वी के साथ आज न तो आरएसएस आया, न विश्व हिंदू परिषद और न बजरंग दल और न कथित हिन्दू सेना? देश का कोई धर्माचार्य वसीम को समाहित नहीं कर पा रहा। सर्वे भवन्तु सुखिनः के जयघोष करने वाले बड़े संत अपने आश्रम में बुलाकर किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। वे जितेंद्र त्यागी तो बने परंतु त्यागी समाज ने भी उन्हें कहाँ अपनाया है? हाल में नोएडा में सांसद महेश शर्मा के विरोध में महापंचायत करने वाले त्यागी समाज को जितेंद्र त्यागी की याद नहीं आई। 
वसीम रिजवी मुस्लिम धर्म पर तल्ख बयानबाजी, धर्मसंसद में न करते तो आराम से रहते। वे शिया हैं और मुस्लिम जगत में शियाओं को अधूरा मुसलमान कहा जाता है। जिस धर्म में वसीम का जन्म हुआ उसकी सबसे पवित्र किताब पर टिप्पणी करने की उन्हें जरूरत नहीं थी। लेकिन उग्र साधुओं के जाल में फँसकर वे उग्र हो उठे।  खैर, जो होना था वह हुआ भी। अब हिंदू समाज और संत समाज का दायित्व यही है कि वो रिजवी को अपनाएं। नहीं अपनाना चाहते तो रिजवी पश्चाताप करें और इस्लाम में अभी वापस लौट जाएं।