लखीमपुर हिंसा: भाजपा के लिए दर्द, कांग्रेस के लिए दवा

 
लखीमपुर हिंसा: भाजपा के लिए दर्द, कांग्रेस के लिए दवा लखीमपुर हिंसा: भाजपा के लिए दर्द, कांग्रेस के लिए दवा

अमित बिश्‍नोई

राजनीति में कब कौन से घटना किसी पार्टी के लिए दर्द और किसी के लिए दवा बन जाय कहना मुश्किल है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के हालाँकि अभी कई महीने बाक़ी हैं मगर चुनावी अखाड़ा अभी से खुद चूका है. पूरे प्रदेश में लखीमपुर हिंसा की घटना को लेकर विपक्षी पार्टियां आसमान सर पर उठाये हुई हैं. मौके पर चौका मारने की सभी कोशिश कर रहे हैं, मगर बाज़ी मारती कांग्रेस पार्टी ही नज़र आ रही है. कहना ग़लत नहीं होगा कि लखीमपुर में किसानों को कार से रौंदने और फिर प्रतिक्रिया में भाजपा कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतारने की घटना से जो माहौल बना उसे प्रियंका गाँधी ने बड़ी अच्छी तरह कैश किया और यूपी में मृतप्राय पड़ी पार्टी में नया जोश भर दिया।

इसके अलावा यह बात भी बिलकुल सच है कि पहली बार प्रियंका वाड्रा की नेतृत्व क्षमता के लोग कायल हुए हैं, इस पूरे मामले में घटना वाले दिन से लेकर जिस प्रकार वह पुलिस को चकमा देते हुए सीतापुर पहुंची और फिर हिरासत और गिरफ़्तारी के बाद पुलिस कस्टडी में 50 घंटे बिताये, पुलिस और प्रशासन के सामने प्रियंका ने जो तेवर दिखाए और फिर जिस प्रकार योगी सरकार को लखीमपुर जाने की मंज़ूरी देने के लिए मजबूर किया वह किसी मामूली नेता के बस की बात नहीं थी. प्रियंका ने सच कहा कि वह इंदिरा गाँधी की पोती हैं और दूसरों को भी यह कहने पर मजबूर किया कि प्रियंका में इंदिरा गाँधी नज़र आई.

Read also: लखीमपुर हिंसा पर त्वरित कार्रवाई करने वाले सीएम योगी की राकेश टिकैत ने की तारीफ

हालाँकि मेरा मानना है कि लखीमपुर के लिए निकली प्रियंका गाँधी का सीतापुर तक पहुँचने में कहीं न कहीं पुलिस प्रशासन की नाकामी का हाथ है या फिर ऐसा भी कह सकते हैं कि उन्हें शायद ऊपर से कुछ इस तरह आदेश दिए गए हों, इसके बावजूद भी प्रियंका गाँधी और कांग्रेस पार्टी ने स्थितियों को जिस प्रकार अपने अनुकूल बनाया उसका अनुमान शायद योगी सरकार को भी नहीं था. सरकार के लिए हालात और ज़्यादा ख़राब होते इससे पहले ही आनन् फानन प्रियंका गाँधी को छोड़ने, एयरपोर्ट पर रोके गए राहुल की सारी शर्तें मानने और फिर लखीमपुर जाने की सर्कार को अनुमति देनी पड़ी. वह कहते हैं न कि “जो बढ़ कर ख़ुद उठा ले हाथ में मीना उसी का है”. प्रियंका गाँधी ने यही किया और इस आपदा को अवसर बदलने में सबसे पहले मैदान पर उतरीं और मौके पर चौका मार दिया।

लखीमपुर हिंसा की इस घटना को कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह हैंडल किया उसका सन्देश सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि पूरे देश में गया है. मृतक किसान परिवारों को पंजाब और छत्तीसगढ़ सरकारों द्वारा 50-50 लाख यानि एक करोड़ रूपये के मुआवज़े का एलान, साथ ही इस हिंसा में मरने वाले पत्रकार के परिवार को भी उतने ही मुआवज़े की घोषणा ने एक सुखद सन्देश पूरे देश में पहुँचाया है.

अगर हम थोड़ा पीछे नज़र डालें तो कांग्रेस पार्टी के लिए कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा था. पंजाब में हंगामा मचा हुआ था, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विद्रोह के स्वर बुलंद हो रहे थे. अगर पंजाब की बात करें तो अमरिंदर और सिद्धू के बीच विवाद के बाद कैप्टन का इस्तीफ़ा और फिर एक दलित सिख का पंजाब में पहली बार सीएम बनना, फिर सिद्धू का इस्तीफ़ा और फिर उनका नरम होना इस बात को दर्शाता है कि कांग्रेस पार्टी में अब फैसले लेने की हिम्मत आ गयी है, इसी तरह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को यूपी चुनाव के लिए मुख्य पर्यवेक्षक बनाकर बाग़ी तेवर अपनाने वाले टी पी सिंघदेव को भी सन्देश दे दिया। राजस्थान में भी गेहलोत को इशारा दे दिया कि अगली उड़ान पायलट भरेंगे।

Read also: लखीमपुर हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट- ऐसी घटनाओं की कोई जिम्मेदारी नहीं लेता

पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस ने जो फैसले लिए हैं उनसे यह बात साफ़ हो जाती है कि कांग्रेस पार्टी भी अब नई राजनीति करना चाहती है. देशद्रोह का आरोप झेल रहे कन्हैया का कांग्रेस में आना इस बात का पुख्ता सबूत है. इन सबसे बढ़कर यूपी में कांग्रेस पार्टी के जमते हुए पैर. प्रियंका की पिछले दो साल की मेहनत ने शायद अब थोड़ा थोड़ा रंग दिखाना शुरू किया। हाथरस हो या लखीमपुर, बढ़ती बेरोज़गारी हो या मंहगाई या फिर कोरोना महामारी में बरती गयी लापरवाई, हर मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी ने ही असल में एक मज़बूत विपक्ष की भूमिका निभाई।

लखीमपुर खीरी में हिंसा के बाद जनता के बीच कांग्रेस पार्टी के प्रति जो सन्देश गया है वह पार्टी के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं जो जोश इस समय नज़र आ रहा है वह गुज़रा ज़माना याद करा रहा है. प्रियंका गाँधी की गिरफ्तारी पर तमाम बंदिशों के बावजूद सीतापुर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जो भीड़ नज़र आयी उससे ऐसा लगा कि जैसे प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है. प्रियंका गाँधी ने इस घटना पर पार्टी का जिस तरह नेतृत्व किया उससे वह कांग्रेसी भी घरों से बाहर निकल आये जो पार्टी से पूरी तरह मायूस होकर एकांतवास में जा चुके थे.

आखिर में सिर्फ एक ही बात, वह यह कि लखीमपुर घटना के बाद कांग्रेस पार्टी के पक्ष जो माहौल बना है, कार्यकर्ताओं में जो जोश पैदा हुआ है अगर वह चुनाव तक बरकरार रहा तो सरकार बने न बने यूपी में पार्टी दोबारा स्थापित ज़रूर हो जाएगी और जिसका फायदा 2024 में पार्टी को मिल सकता है. यूपी में कांग्रेस अगर किंगमेकर ही बन गयी तो भी यह उसके लिए किंग बनने के जैसा ही होगा।