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महिलाओं की सेहत पर नया अलार्म: शहरों में हर दूसरी महिला मोटापे की चपेट में, डिजिटल पहुंच बढ़ी पर ग्रामीण भारत अब भी पीछे

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NFHS-6 ने खोली जीवनशैली संबंधी बीमारियों की पोल, मोटापा और हाई ब्लड शुगर के मामले तेजी से बढ़े।
शिक्षा, बैंकिंग और इंटरनेट उपयोग में महिलाओं ने लगाई लंबी छलांग, बच्चों के स्वास्थ्य संकेतकों में भी सुधार।

नई दिल्ली। देश के सामाजिक और स्वास्थ्य परिदृश्य की ताजा तस्वीर पेश करने वाले नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (NFHS-6) ने कई अहम संकेत दिए हैं। सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और डिजिटल पहुंच में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन इसके साथ ही मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

सर्वे के अनुसार 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 30.7 प्रतिशत महिलाएं अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित हैं। शहरी क्षेत्रों में यह स्थिति और गंभीर है, जहां 42.8 प्रतिशत महिलाएं मोटापे की श्रेणी में पहुंच चुकी हैं। ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। पुरुषों में भी मोटापे की दर बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गई है, जो बदलती जीवनशैली का संकेत है।

मधुमेह की चुनौती भी तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। 15 वर्ष से अधिक आयु की 17.8 प्रतिशत महिलाओं में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया या वे इसके नियंत्रण के लिए दवाओं पर निर्भर हैं। पुरुषों में यह अनुपात 20.9 प्रतिशत है। विशेषज्ञ इसे खानपान की आदतों और शारीरिक गतिविधियों में कमी से जोड़कर देख रहे हैं।

हालांकि सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर महिलाओं की स्थिति मजबूत हुई है। इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 52.9 से बढ़कर 73.4 हो गया है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग 42 प्रतिशत महिलाएं अब भी इंटरनेट की पहुंच से बाहर हैं। महिलाओं द्वारा स्वयं बैंक खाते संचालित करने का प्रतिशत बढ़कर 89 प्रतिशत पहुंच गया है, जबकि मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव दर्ज हुआ है। 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की आधे से अधिक महिलाएं अब 10 वर्ष या उससे अधिक समय तक स्कूल में पढ़ाई कर रही हैं, जो पिछले सर्वे की तुलना में बड़ा सुधार माना जा रहा है।

बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य संकेतकों में भी प्रगति देखने को मिली है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और टीकाकरण कवरेज में सुधार हुआ है। डायरिया के मामलों में गिरावट भी दर्ज की गई है। कुल मिलाकर सर्वे यह संकेत देता है कि विकास की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी नई चुनौतियां भविष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।

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