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देरी से आये नेताजी युवक को पीटने को दौड़े

कोरोना वैक्सीनेशन का भी उद्घाटन कर श्रेय लेना चाहते हैं नेता
देरी से पहुंचने पर हुआ विरोध तो भड़के नेताजी मारने को दौडे़

वाराणसी। कोरोना काल में भी राजनीतिक लाभ उठाने का कोई मौका नेता छोड़ना नहीं चाहते। कोरोना वैक्सीनेशन का भी श्रेय लेने को बेताब नेताजी इस अभियान का भी उद्घाटन ऐसे कर रहे हैं जैसे यह सरकार की बड़ी उपलब्धि हो। जनता के पैसे से, जनता को ही कोरोना वैक्सीन लगवाने वाले नेताजी समय से आने को भी तैयार नहीं हैं। लोग घंटो लाइन में खड़े रहे कि मंत्रीजी आयेंगे, उद्घाटन करेंगे तो उन्हें कोरोना वैक्सीन लगेगी। मगर मंत्रीजी अपनी नेतागर्दी में देरी से आये, विरोध किया तो युवक को मारने के लिये दौड़ पड़े। अब सोशल मीडिया पर फोटो वायरल हो रही हैं तो नेताजी को छवि खराब होने की चिंता सता रही है।

दरअसल वाराणसी के लगभग सभी सेंटरों पर शनिवार को 18 से 44 आयु वर्ग वालों का बहुप्रतीक्षित टीकाकरण शुरू हुआ। प्रशासन ने टीकाकरण के लिये 12 बजे का समय निर्धारित किया था। वहीं हर बात को लेकर फीता काटने को बेचैन नेताओं ने इस टीकाकरण अभियान का भी उद्घाटन करने की ठान ली। इस वजह से टीकाकरण अभियान देर से शुरू हुआ और लोगों को घंटो कतार में लगने को मजबूर होना पड़ा।

शिवपुर सीएचसी पर मंत्री रविंद्र जायसवाल को टीकाकरण अभियान का शुभारम्भ करना था। लेकिन आदत से मजबूर मंत्री जी लेट पहुंचे तो घंटो से लाइन में खड़े संजय दुबे नामक युवक ने नाराजगी जताई। व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए संजय दुबे ने खरीखोटी सुनाई तो मंत्रीजी का पारा हाई हो गया। अपने पद की गरिमा और खुद के देर से आने की गलती को भूल कर मंत्रीजी युवक को मारने के लिये दौड़ पड़े। हालांकि संजय दुबे के पास पहुंचने से पहले उनके सुरक्षाकर्मियों और समर्थकों ने मंत्रीजी को रोक लिया। मगर तब तक संजय दुबे को मारने के लिये दौड़ रहे मंत्रीजी की तस्वीरें कैमरों में कैद हो चुकी थीं। संजय दुबे का भी कहना है कि व्यवस्था पर सवाल उठाने पर मंत्रीजी भड़क गये और उनको मारने के लिये दौड़ पड़े।

अब सवाल यह है कि कोरोना महामारी के दौरान क्या कोरोना टीकाकरण अभियान का भी नेताओं के द्वारा उद्घाटन करना उचित है। क्या लोगों की जान बचाने के लिये चलाये जा रहे अभियान को शांतिपूर्वक और कुशलतापूर्वक संपन्न कराये जाने की बजाये चारो ओर भीड़ इकट्ठा कर मीडिया में फोटो खिंचवा कर श्रेय लूटना जरूरी है। क्या ऐसी महामारी में भी नेतागिरी दिखाना नैतिकता कहलायेगा और क्या ऐसे नेताओं को जनता माफ कर पायेगी?

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